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अमेठी में फूड पार्क

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आजकल संसद में व बाहर अमेठी में फूड पार्क को लेकर चर्चाएँ तेज हैं। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि मोदी ने देश में बदलाव लाने का वादा किया था लेकिन इसके विपरीत बदला ले रही है। समान्यतया बदलाव शब्द से यथास्थिति में परिवर्तन का बोध होता है। बदलाव के दो पक्ष होते हैं। पहला सकारात्मक पक्ष जो यथास्थित से सृजनात्मकता के भाव में आगे बढ़ता है; दूसरा नकारात्मक जो पहले के विपरीत दिशा में गतिमान होता है। इसे सहज शब्दों में यथास्थिति से ऊर्ध्व और अधोगति मानक भाव से भी समझा जा सकता है। बदलाव शब्द का बदला से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। न तो दोनों समानार्थी हैं और न ही विपरीतार्थी। अन्य शब्दों की भांति इन्हे भी एक दूसरे के साथ संदर्भित किया जा सकता है। वस्तुतः आजकल, यदा-कदा, हिट एण्ड रन के मनोभाव में राहुल गांधी का सदन में प्रकट होना और मोदी सरकार के बदलाव की सकारात्मक सोच को बदला के रूप में निरूपित करना, उनके अंदर चल रहे किंकर्तव्य विमूढ़ की मनोदशा को परिलक्षित करता है। राजनीति एक ऐसा प्रोफेशन है जिसमें प्रामाणिकता एवं निरंतरता होना परम आवश्यक होता है। कम से कम ये दोनों चीजें फिलहाल राहुल गांधी में तो नहीं हैं। कई दिन गायब होने के बाद जब सदन में आते हैं तो अपने को हरक्युलियन रोल में स्थापित करने का प्रयास करते हैं। कोई सांसद अप्रामाणिक या यों कहें कि गलत तथ्यों के आधार पर किसी अप्रासांगिक विषय पर केवल तूफानी व अपरिपक्व भाषण के सहारे अपनी पार्टी या देश में सर्वमान्य नेता के रूप में अपने को स्थापित करने का प्रयास करे तो उसे कदापि सफलता नहीं मिलने वाली है। ऐसा ही कुछ प्रयास राहुल गांधी द्वारा सदन में अमेठी में स्थापित होने वाले मेगा फूड पार्क के सम्बन्ध में उठाए गए मामले में किया गया। बदले की भावना से पार्क को निरस्त किए जाने का जो विषय उठाया गया वह बेवजह, भ्रामक एवं झूठे तथ्यों पर आधारित है क्योंकि वर्ष 2010 में स्वीकृत परियोजना कांग्रेस सरकार के दौरान ही विभिन्न कारणों से स्वतः निरस्त होने की स्थिति में थी। बावजूद इसके राहुल गांधी ने वोटबैंक को ध्यान में रखकर 2013 में फूड पार्क का शिलान्यास किया। उनका यह कृत्य अमेठी की जनता विशेषकर किसानों, मजदूरों, बेरोजगारों आदि के साथ धोखा था। सदन में उन्होने अपने वक्तव्य में सूट का पुनः उल्लेख कर चुटकी लेते हुये मोदी को सीधे निशाने पर लिया जो उनके हल्केपन को उजागर करता है। अब तो मोदी सरकार को ‘सूट-बूट की चोर सरकार’ कह कर अमर्यादित व्यवहार करने लगे हैं। अपने को किसान हितैषी एवं बिना किसी तथ्य के बात-बात में मोदी सरकार को कॉर्पोरेट समर्थक सिद्ध करने का कांग्रेस का प्रयास नकारात्मकता की ओर बढ़ता दिख रहा है।
यह कितने आश्चर्य की बात है कि राहुल गांधी को फूड पार्क, जिसका उन्होने स्वयं शिलान्यास किया, की याद तब आयी जब वे सत्ता से बाहर हो गए। खादद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने राहुल के उठाए गए सवालों पर उनसे उल्टे ही जब यह जानना चाहा कि वे तब कहाँ थे जब दस माह पूर्व परियोजना औपचारिक रूप से निरस्त की गई, वे बगलें झाँकने लगे। वास्तविता तो यह है कि राहुल गांधी को अपनी पार्टी की सत्ता के दौरान ही फूड पार्क के भविष्य का पता था लेकिन उन्होने इसे नई सरकार की बदले की कार्यवाही का मुद्दा बनाकर घेरने का असफल प्रयास किया, जिसमे वे खुद फंस गए। अस्तु अपनी पार्टी के शासन काल के दौरान लगभग पाँच वर्षों की अवधि में फूड पार्क स्थापित न करा सकने वाले राहुल के पास कोई नैतिक अधिकार नहीं कि वे वर्तमान सरकार पर बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाएँ। ख़ैर, इन सब बातों से परे इस मुद्दे पर यह प्रश्न तो उठना लाजमी है कि फूड पार्क अमेठी में ही क्यों? क्या देश के अन्य क्षेत्रों के बेरोजगार युवाओं को रोजगार की आवश्यकता नहीं? क्या अमेठी, रायबरेली का विकास ही पूरे देश का विकास है? निश्चित रूप से इन प्रश्नों का उत्तर ‘नही’ में होगा लेकिन दुखद है कि विषयान्तर्गत इस बिन्दु पर संसद के अन्दर और बाहर कहीं भी कोई चर्चा नहीं हो रही है। मीडिया भी इस मुद्दे पर चुप है।
सभी दल पंथ और समुदाय को ध्यान में रखकर समावेशी विकास की बात तो करते हैं लेकिन क्षेत्र के आधार पर क्यों नहीं? क्या देश के सभी क्षेत्रों का समान एवं संतुलित रूप से विकास नहीं होना चाहिए? क्या देश के सभी संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्रों के विकास के लिए समान रूप से ध्यान नहीं देना चाहिए? इन प्रश्नों का एक ही उत्तर होगा कि सभी क्षेत्रों का बिना भेदभाव के समान विकास होना चाहिए लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? बिल्कुल नहीं। देश के कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमे अभी तक विकास की पहली किरण तक नहीं पहुंची है। जहां राहुल एवं सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी और रायबरेली, मुलायम के गाँव सैफई, बहू डिम्पल यादव के संसदीय क्षेत्र कन्नौज, मायावती के गाँव बादलपुर (सहारनपुर), नोएडा, आज़म खान के रामपुर आदि में विकास के नाम हजारों करोड़ खर्च कर दिये गए, वहीं महाराजगंज एवं श्रावस्ती जैसे देश के अनेक जिला मुख्यालय अभी तक रेल मार्ग से नहीं जुड़ सके हैं। उत्तर प्रदेश को अबतक मिली कुल केंद्रीय परियोजनाओं में से अस्सी प्रतिशत से अधिक केवल अमेठी एवं रायबरेली के लिए स्वीकृत की गईं। कांग्रेस के केवल पिछले दस वर्षों के शासन को ही लें तो स्पष्ट होता है कि केंद्र की कोई परियोजना अमेठी और रायबरेली के अलावा किसी अन्य स्थान के लिए स्वीकृत नहीं हुई। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में एम्स परियोजना द्वितीय चरण (पीएमएसएसवाई) के अंतर्गत पश्चिम बंगाल के साथ स्वीकृत हुई थी लेकिन अपने निर्धारित समय से करीब पाँच साल बाद जमीन पर उतरी। कारण स्पष्ट था कि मायावती सरकार राजनैतिक स्वार्थवश इसे बुंदेलखंड में स्थापित करना चाहती थी लेकिन कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार भी इन्हीं कारणों से रायबरेली के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान के लिए किसी भी कीमत पर सहमत न थी। अपने को आम आदमी का रहनुमा कहने वाली कांग्रेस की तत्कालीन केंद्र सरकार ने उ॰ प्र॰ के 20 करोड़ आबादी को एम्स जैसे उच्चस्तरीय चिकित्सा संस्थान की सुविधाओं से बंचित रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अंततः एम्स खोले जाने के लिए निर्धारित मापदण्डों की उपेक्षा कर संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ से मात्र 60 कि॰ मी॰ पर स्थित रायबरेली जनपद के बन्नामऊ में खोलने की स्वीकृति मिली, जबकि इतने आस-पास एक ही स्तर के दो संस्थान खोलने का कोई औचित्य नहीं था। रायबरेली में ही स्थापित करने की सोनिया गांधी की इच्छा एम्स स्वीकृति की मापदंड बनी। यही है समावेशी विकास का कांग्रेसी सिद्धान्त।
कांग्रेस की ही तर्ज पर मुलायम सिंह यादव ने भी अपने गाँव में हजारों करोड़ खर्च किया है। सैफई में ग्रामीण चिकित्सा विश्वविद्यालय, आधुनिक स्टेडियम, एयरपोर्ट, अत्याधुनिक अतिथिगृह, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स कॉलेज, स्विमिंगपूल आदि स्थापित किए गए है। सैफई में सड़कों का जाल बिछा हुआ है। गाँव को अवाधित चौबीस घंटे बिजली-पानी की आपूर्ति सुनिश्चित है। आठ लेन की आगरा-लखनऊ सुपर एक्सप्रेस वे भी सैफई से होकर जा रही है। बगल में लायन सफारी भी स्थापित हुआ है। बहू के संसदीय क्षेत्र कन्नौज (नव-निर्मित जनपद) में मेडिकल एवं इंजीयरिंग कॉलेज जैसे संस्थान खुले हैं। मायावती ने लखनऊ एवं नोएडा के अतिरिक्त अपने गाँव बादलपुर में 300 हेक्टेयर भूमि पर पार्क, स्मारक, अपनी मूर्ति एवं हेलीपैड निर्माण में हजारों-हजार रुपये व्यय किया है। नगर विकास मंत्री के रूप में आज़म खान ने रामपुर को अत्याधुनिक शहर के रूप में विकसित कर रहे हैं। उनके लिए धन कोई समस्या नहीं है, भले ही दूसरे नगरों को धनाभाव के कारण सड़क, बिजली एवं पानी जैसी न्यूनतम सुविधायें उपलब्ध कराने में भी कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा हो। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपने जनपद रोहतक के विकास में प्रदेश के कोष का बहुत बड़ा भाग खर्च किया, जिसको लोगों ने भेद-भाव एवं बेईमानीपूर्ण कृत्य माना। इसके ठीक दूसरी ओर देखिये अटल बिहारी बाजपेई ने प्रधानमंत्री रहते हुए अपने ससदीय क्षेत्र लखनऊ के लिए वही किया जो समान रूप से अन्य के लिए किया। वर्ष 2014-15 में पूर्वाञ्चल के लिए अलग से एक एम्स स्वीकृत हुआ था। प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के कारण वाराणसी की दावेदारी सबसे मजबूत थी लेकिन निर्धारित मापदण्डों पर एकत्र सूचना के आधार पर एम्स की स्थापना के लिए गोरखपुर को उपयुक्त पाया गया और उसे चुना गया। यह है सही मायने में समावेशी क्षेत्रीय विकास का आदर्श उदाहरण।
अंत में, राजनेताओं को इस बात पर चिंतन करने की अति आवश्यकता है कि देश के करदाताओं के पैसे का व्यय कुछ क्षेत्र विशेष के विकास में ही क्यों हो। देश के स्वतंत्र होने के बाद से लगातार फूलपुर, रायबरेली एवं अमेठी में अनेक परियोजनाएं लगाई जाती रही हैं जिसका अब बंद होना राष्ट्रहित में है। देश के संसाधनों का सभी क्षेत्रों के समान रूप से विकास में उपयोग होना चाहिए लेकिन राजनेताओं के भ्रष्ट आचरण के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। परिणामतः विकास के संदर्भ में क्षेत्रीय असंतुलन के कारण देश में अराजकता का माहौल पैदा हो रहा है। नए राज्यों के निर्माण की मांग को रोक पाना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल होगा। सत्ता में बने रहने के लिए ये पार्टियां किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार हैं भले ही देश और समाज की कितनी भी आपूरणीय क्षति हो। साथ ही सरकारी खजाने का मुंह अपने ही क्षेत्र के विकास के खोल देना राजनैतिक भ्रष्टाचार एवं खुली बेईमानी है। अब समय आ गया है कि सही मायने में समावेशी एवं संतुलित क्षेत्रीय विकास की ओर बिना किसी दबाव के आगे बढ़ा जाये जिसमें क्षेत्र के आधार पर किसी प्रकार के भेद-भाव कि गुंजाइस न हो। अमेठी में ही फूड पार्क क्यों, का यही सटीक उत्तर होगा।

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