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राजनीति में बाउंसर

Posted On: 10 Apr, 2015 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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देश में पिछले अनेक वर्षों से निजी सेक्युरिटी कम्पनियाँ विभिन्न सुरक्षा सेवाएं दे रही हैं। उन्ही में से एक बाउंसर सेवा है। इस सेवा के अंतर्गत नियुक्त बाउंसर किसी आयोजन में अव्यवस्था को अंजाम देने वाले व्यक्ति या समूह को सक्रिय होने से पहले ही बेहद फूर्ति से कार्यवाही करते हुए नियंत्रण में ले लेते हैं। आजकल निजी आयोजनों में तो सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखने के लिए बाउंसरों की सेवाएं ली जाने लगी हैं लेकिन किसी राजनैतिक पार्टी या सरकार ने सेवाए ली हों, यह पहली बार देखने को मिला। विगत रविवार को आम आदमी पार्टी नीत दिल्ली सरकार द्वारा भ्रष्टाचार सम्बंधी शिकायत के लिए हेल्प लाइन नम्बर जारी करने हेतु तालकटोरा स्टेडियम में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह एक सरकारी कार्यक्रम था। इसमे प्रमुख सहभागिता आमजन एवं आप कार्यकर्ताओं की थी। सुरक्षा व्यवस्था के लिए प्रयाप्त संख्या में स्टेडियम के अंदर और बाहर दिल्ली पुलिस तैनात की गयी थी। फिर भी लगभग दो दर्जन हृष्ट-पुष्ट बॉडी बिल्डर बाउंसर तैनात किये गए थे। अब प्रश्न उठता है कि बाउंसरों की क्या आवश्यकता पड़ गई? सरकारी कार्यक्रम में बाउंसर क्यों? किन लोगों से अव्यवस्था फैलने का डर था? क्या अपने कार्यकर्ताओं से भय था? यदि हाँ, तो यह कैसी आमजनों की पार्टी और, यदि नहीं, तो बाउंसर क्यों? इन्ही बाउंसरों ने आयोजन में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जिसे लोगों ने टीवी पर देखा। मीडिया के लोगों के साथ भी दुर्व्यवहार हुआ। इसके पूर्व पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाग ले रहे एक सदस्य को इन्हीं बाहुबलियों से बाहर खिंचवाकर मार-पिटाई की गई। बाउंसरों ने अपने नाम व गुण के अनुसार कार्य किया जो उनकी ड्यूटी का हिस्सा है। प्रायः राजनैतिक पार्टियों द्वारा अपने कार्यक्रमों में पुलिस के साथ-साथ अपने कार्यकर्ताओं का सहयोग लिया जाता है। ‘आप’ तो ‘पार्टी विद डिफरेन्स’ है-बाउंसर सेवा लेना कम से कम तो यही सिद्ध करता है।

एक पार्टी (आप) जिसके नेता गाँधी जी के सिद्धांतो पर चलने का दावा करते हैं, स्वराज्य की बातें करतें हैं, उन्हें अब अपने ही कार्यकर्ताओं को नियंत्रित करने के लिए बाउंसरों की सेवा लेनी पड़ रही है। उन्हें उस समय बाउंसरों की आवश्यकता नहीं पड़ी जब गांधीवादी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में लोकपाल के लिए चल रहे जनांदोलन में लाखों की भीड़ जुटती थी। वास्तव में तब भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध एवं लोकपाल संस्था के निर्माण के लिए एक स्वफूर्त आंदोलन था। भ्रष्ट राजनीति के खिलाफ आक्रोश था। सब कुछ स्व-नियंत्रित एवं अनुशासित था। अतएव बाउंसर जैसी सेवा की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन ज्योंही केजरीवाल और उनके साथियों ने राजनीति में घुसकर राजनीति को शुद्ध करने का सपना दिखाया, उनका असली ध्येय उजागर हो गया। उनकी यह राजनीति में बाउंस करने की महत्वाकांक्षा ही थी कि उन्होंने अच्छे-खासे जनांदोलन को लक्ष्य तक पहुचने से पहले ही मिटटी में मिला दिया। गुरू अन्ना हज़ारे की इच्छा के विपरीत अरविन्द केजरीवाल ने राजनैतिक दल बनाया। और अब जिन पार्टी कार्यकर्ताओं एवं सहयोगियों के समर्थन से चुनाव जीतकर दिल्ली राज्य के शासक बने उन्ही को नियंत्रित करने के लिए बाउंसर लगा रहे है। कहने को तो यह आम आदमी की पार्टी है लेकिन कार्यक्रम में लगे ‘वीवीआईपी’ मार्ग सूचक संकेत से तो ऐसा कुछ भी आभास नहीं होता। फिर आदर्श राजनीति का ढोंग क्यों?

देश में आम आदमी पार्टी के उदय के साथ एक नयी तरह की राजनीति का उदय हुआ। दूसरे पर आरोप लगाकर भाग जाना लेकिन प्रमाण न देना, स्टिंग करना और सनसनी खेज खुलासा करना लेकिन प्रमाणिकता नहीं सिद्ध करना, पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र की बात करना लेकिन उसके ठीक उल्टा कार्य करना, वोट के लिए इमाम से अपील करवाना लेकिन पंथनिरपेक्ष होने का दावा करना, बात-बात में दूसरों को चोर और अपने को ईमानदार कहना, जिसको भ्रष्टतम कहना उसी पार्टी के साथ उन्चास दिन की सरकार चलाना और आगे चलाने के लिए सहयोग मांगना, अपने ही व्यक्तियों से अपने विधायकों को बीजेपी नेताओं के नाम से दस करोड़ की लालच का फर्जी फोन करवाकर पार्टी को बदनाम करने का प्रयास करना, खुद दो करोड़ कालाधन हेर-फेर द्वारा चंदे के रूप में लेकर सफ़ेद धन बनाना लेकिन और दलों पर अनियमित चंदे का आरोप लगाना, जनलोकपाल के नाम पर सरकार बलिदान कर देने की बातें करना लेकिन अभूतपूर्व बहुमत की सरकार होने के बावजूद अबतक कुछ न करना, अपने आतंरिक जनलोकपाल को बिना कारण हटा देना आदि ऐसे अनेक उदहारण हैं जो इस बात को समझने के लिए प्रयाप्त हैं कि यह पार्टी दूसरी पार्टियों से कितनी अलग है। हालाँकि यह सच है कि लोगों को आशा थी कि ‘आप’ एक अलग तरह की पार्टी होगी जिसमे ईमानदारी होगी, पारदर्शिता होगी, आतंरिक लोकतंत्र होगा-सबकुछ होगा।

वस्तुतः अबतक के क्रिया-कलाप के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी के गठन के पीछे न तो सिद्धांत है और न ही कोई नीति है। यह पार्टी मात्र स्वयंसेवी संस्थाओं के महत्वाकांक्षी कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, खोजी अभिकर्ताओं, तथाकथित बुद्धिजीवियों, सेक्युलरिस्टों, वाममार्गी विचारकों, दिग्भ्रमित नौकरी-पेशा युवाओं का जमावड़ा है। आंदोलन से जन्मी पार्टी स्वराज और सुराज का झूठा सपना दिखाकर सत्ता पाने की सोपान मात्र है। जहाँ घूसखोरी की स्टिंग के लिए घूस देने की बात की जाती हो अर्थात बुराई को बुराई से मिटाने की बात होती हो, वहाँ किसी सकारात्मक सोच की कल्पना कैसे की जा सकती है। जब अपनी ही दल के नेताओं को गाली देने का स्टिंग सामने आता है तो पहले झुठलाया जाता है और बाद में माफ़ी मांग ली जाती है। ऐसी स्थिति में जब कोई व्यक्ति स्टिंग में घूस लेते हुए पकड़े जाने पर माफ़ी मांग लेता है तो क्या छोड़ दिया जाएगा? सच तो यह है कि ये सब अराजक रास्ते है जिनके आधार पर सत्ता नहीं चलाई जा सकती है। लेकिन जब पार्टी का मुखिया ही कहता है कि मैं अराजक हूँ तो ऐसे दल की नीति, सिद्धांत एवं उद्देश्य के बारे में क्या कहना। वो तो अराजकता भरी होगी ही। और जहाँ आराजकता होगी वहां बाउंसर की आवश्यकता पड़ेगी ही। परिणामतः आम आदमी पार्टी की राजनीति में बाउंस करने की महत्वाकांक्षा के कारण बाउंसर संस्कृति का प्रवेश हो रहा है। अब जनता तय करे उसकी सोच क्या है।

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
April 11, 2015

कौन होगा सही विकल्प ? जनता अभी भी अँधेरे में है …सभी पार्टियां लगभग एक सामान ही ब्यवहार कर रही है सादर!

rameshagarwal के द्वारा
April 10, 2015

जय श्री राम सार्थक लेख के लिए बधाई.आप का पूरा कला चिट्टा खोल दिया बड़े अच्छे शब्दों में.दिल्लीवाशी शयद अब ऐसी गलती दुबारा न करे.भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू लडाई मोदी विरोध में आकर रुक गयी.

Shobha के द्वारा
April 10, 2015

डॉ साहब बहुत अच्छा लेख बड़ी – बड़ी बाते और उससे भी बड़े प्रलोभन दे कर सत्ता पकड़ ली अब जनता से दूर हो रहें और बाउंसर द्वारा अपनी सुरक्षा की कोशिश कर रहे हैं समयानुकूल लेख डॉ शोभा

Madan Mohan saxena के द्वारा
April 10, 2015

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