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अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा

Posted On: 6 Apr, 2015 Others में

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पिछले दिनों दिल्ली सहित देश के एक-दो अन्य स्थानों पर गिरजाघरों में तोड़-फोड़ की कुछ घटनाएँ हुईं। प. बंगाल के नादिया जिले में 71 वर्षीय नन के साथ रेप काण्ड हुआ। ये घटनाएँ बेशक निंदनीय थीं। ऐसी घटनाओं से सभी दुखी थे। प्रधानमंत्री ने भी गहरी चिंता व्यक्त की। पुनरावृति रोकने के लिए कड़े निर्देश दिये। इस तरह की घटनाएँ निश्चित तौर पर देश की छबि धूमिल करती हैं। साथ ही देश के ताने-बाने को कमजोर करती हैं। लोकतन्त्र में सभी को अपनी आस्था के अनुसार पंथ को अपनाने व वर्तने की स्वतन्त्रता है। इस देश के संविधान में पंथिक स्वतन्त्रता नागरिकों के मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित है। इतना ही नहीं भारत में सभी नागरिकों को समान रूप से जितनी पंथिक स्वतन्त्रता मिली है, शायद ही विश्व के किसी अन्य देश में मिली हो। फिर भी अल्पसंख्यक समुदाय के मन में इसके विपरीत सोच बनी हुई है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रहे जूलियो फ्रांसिस रिबेरो एवं सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश कुरियन जोसेफ़ के हालिया बयान इसकी पुष्टि करते हैं। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने भी बीते दिनों जयपुर में सम्पन्न अधिवेशन में कहा कि मुसलमान अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं क्योंकि देश को फासीवादी राज्य में बदलने का प्रयास चल रहा है।

किसी भी समुदाय के पूजा स्थलों, संस्थाओं, व्यक्ति या व्यक्तियों के साथ होने वाली बर्बर घटनाओं की कड़ी से कड़ी भर्त्सना की जानी चाहिए। पंथ के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं होना चाहिए। ईसाई समुदाय से जुड़ी बीते दिनों की घटनाओं की पूरे देश ने कड़ी निंदा की। सभी ने दोषियों को कठोर से कठोर सजा देने की मांग की। तथाकथित मानवाधिकारवादियों, बुद्धजीवियों एवं पत्रकारों ने अपने सेक्युलर चश्मे से विवेचना करने के अवसर को किसी भी हालत में अपने हाथ से निकलने नहीं दिया। सो इस सेक्युलर समूह ने पुलिस जांच परिणाम की प्रतीक्षा किए बिना ही मन-मस्तिष्क में पूर्व स्थापित सोच के आधार पर आरएसएस एवं उसकी आनुषांगिक इकाइयों के ऊपर इन घटनाओं के पीछे हाथ होने का दोष मढ़ना शुरू कर दिया। ममता बनर्जी को तो अल्पसंख्यक वोटबैंक को अपनी ओर मोड़ने का ऐसा सुनहरा मौका हाथ से यों ही निकल जाने देना स्वीकार्य नही था। अतएव उनकी पार्टी ने नन रेप के मात्र कुछ ही घंटो बाद इस घटना के पीछे आरएसएस एवं वीएचपी का हाथ बताते हुए बीजेपी को घेरना शुरू कर दिया। इसी तरह कांग्रेस सहित सभी तथाकथित सेक्युलर दलों ने चर्च एवं नन से जुड़ी घटनाओं के पीछे अतिवादी हिन्दू संगठनों का हाथ बताते हुए सड़क से संसद तक भाजपा एवं मोदी सरकार को घेरा। मीडिया पीछे क्यों रहती। सो इसने भी कई दिनों तक इन घटनाओं का प्रमुखता के साथ प्रसारण किया। अपने को सेक्युलरिस्म का स्वयंभू चैम्पियन मानने वाले टीवी चैनलों के एक वर्ग ने अपनी खोजिया पत्रकारिता के अन्वेषण में इन घटनाओं के कारणों एवं इनके पीछे की शक्तियों के बारे में बताने में तनिक विलंब नहीं किया। उनका इशारा भी उसी ओर था जिस ओर उक्त समूहों एवं राजनैतिक दलों का था।

अब जबकि नादिया नन बलात्कार केस का पर्दाफाश हो चुका है, और जिसमे पकड़े गए सभी अपराधी बंग्लादेशी मुसलमान हैं, ममता बनर्जी एवं उनकी पार्टी क्यों मौन है? अब क्यों नहीं कांग्रेस और उनका कुनबा कुछ बोलता? कहाँ गया जनता परिवार? कहाँ गई सेक्युलर इलेक्ट्रोनिक मीडिया? तथाकथित मानवाधिकारवादियों, बुद्धजीवियों एवं पत्रकारों की जमात। इस पर्दाफाश पर क्या कहेगी? कहाँ गए अय्यर, नैयर जो बटला हाऊस काण्ड में इंस्पेक्टर मोहन शर्मा को उग्रवादियों (मुस्लिम युवाओं) को मार गिराने का दोषी मानते है? कहाँ गई आम आदमी पार्टी जिसके नेता एवं कार्यकर्ता दिल्ली चुनाव के दौरान ईसाई समुदाय के विरोध प्रदर्शन में सक्रिय भाग ले कर बीजेपी पर गिरजाघरों में तोड़-फोड़ का आरोप लगा रहे थे। अब ऐसा क्या हो गया कि दिल्ली के गिरजाघरों में चुनाव के बाद से अबतक एक भी घटना नहीं हुई? इस बात पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। कहीं ऐसा तो नहीं हैं अल्पसंख्यक वर्ग के वोटों को एकमुष्ठ अपनी ओर खीचने/ध्रुवीकरण के लिए षड्यंत्र के तहत गिरजाघरों मे लगातार कई घटनाओं को अंजाम देकर बीजेपी एवं केंद्र सरकार कटघरे में घेरने का कुत्सित प्रयास किया गया हो। इस आशंका को आम आदमी पार्टी से संबन्धित उस रहस्योद्घाटन से बल मिलता है जिससे उसके द्वारा अपने ही विधायकों को दस करोड़ रुपये में खरीदने के लिए अरुण जेटली और गडकरी के नाम से अपने ही सदस्य से फर्जी फोन करवाया गया। अल्पसंख्यकों का एकमुष्ठ वोट आप को मिलना भी इस आशंका की पुष्टि करता है। वस्तुतः इन घटनाओं के पीछे की सच्चाई सामने आने के बाद अब क्यों नही बोलती सेक्युलर ज़मात?

अभी दो दिन पहले रामकृष्ण मिशन के बेलूर मठ, हावड़ा पर किए गए बम विस्फोट पर ममता दीदी सहित सभी स्व्यंभू पार्टियां, मानवाधिकारवादी संगठन, व्यक्ति, सेक्युलर बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार एवं चिंतक क्यों चुप है? कहाँ गए रिबेरो और कुरियन? इस मसले पर उनका मौन रहना उनकी सेक्युलर सोच पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। उनकी सोच का खोखलापन उजागर करता है। अगर यही घटना हिन्दू मंदिर में न होकर किसी मस्जिद या गिरजाघर में हुई होती तो अबतक यही सेक्युलर ज़मात पूरी कायनात को अपने सिर पर उठा लेती। इलेक्ट्रोनिक मीडिया अबतक तूफान मचा चुका होता लेकिन आज कोई चर्चा नही, सेलेक्टिव क्यों है? संभवतः उनके शब्दकोष में सेक्युलरिस्म का अर्थ केवल और केवल माइनरटिज़्म (अल्पसंख्यकवाद) है। अतः पूरी सेक्युलर जमात उक्त दो प्रकरणों पर मौन धारण किए हुए है। फिर भी बताइये तो सही अब मौन क्यों?

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
April 10, 2015

जय श्री राम  बहुत सटीक और तथ्यों से भरिपूर.आज ही हमने इसी पर ब्लॉग लिखा है हम साहित्य के नहीं इसलिए ज्यादा अच्छा नहीं लिख पाते. सेचुलारिस्ट्स बुद्धिजीवी,लेखक, कुछ टीवी चैनल्स और इंग्लिश मीडिया देश के दुश्मन है और बदनाम कर रहे..


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