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गांधी जी की पुण्यतिथि : एक कड़वा सच

Posted On: 29 Dec, 2014 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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तीस जनवरी गांधी जी की पुण्यतिथि है। छाछठ वर्ष पूर्व इसी दिन नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की गोली मार कर हत्या कर दी थी। नाथूराम गोडसे को लेकर आजकल विवाद छिड़ा हुआ है। विवाद मंदिर बनवाकर उसमे गोडसे की मूर्ति स्थापित करने के प्रस्ताव को लेकर है। यह गांधी और गोडसे के विचारधाराओं के बीच का द्वन्द वस्तुतः गांधी समर्थकों एवं गांधी विरोधियों के रूप में प्रखर होता हुआ दिख रहा है। यद्यपि कि यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि गांधी जब जीवित थे तब भी उनके विचारों से बहुत लोग सहमत नहीं थे। यहाँ तक कि स्वतन्त्रता आंदोलन में उनके साथ रहे उनके अनेक कांग्रेसीजन भी। गोडसे के विचारों से तो अधिकांश लोग नहीं। बाद में देश की राजनीति ने इन्हीं दो विचारों को ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘सांप्रदायिक’ नाम से परिभाषित कर दिया। गांधी के समर्थकों ने जिस सेक्युलरिज़्म का पाठ उनसे पढ़ा, वह सत्य के कसौटी पर कदापि खरा नहीं उतरता। इस बात की पुष्टि गांधी जी के वक्तव्यों एवं मंतव्यों से स्वतः होती है।
हम यहाँ स्वामी श्रद्धानन्द की पुण्यतिथि, जिसे बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है, की चर्चा के माध्यम से बात को आगे बढ़ाएँगे। 23 दिसंबर, 1926 को अब्दुल रशीद नामक एक उन्मादी युवक ने धोखे से गोली चलाकर स्वामी जी की हत्या कर दी। यह युवक स्वामी जी से मिलकर इस्लाम पर चर्चा करने के लिए एक आगंतुक के रूप में नया बाज़ार, दिल्ली स्थित उनके निवास गया था। वह स्वामी जी के शुद्धि कार्यक्रम से पागलपन के स्तर तक रुष्ट था। इस घटना से सभी दुखी थे क्योंकि स्वामी दयानन्द सरस्वती के दिखाये मार्ग पर चलने वाले इस आर्य सन्यासी ने देश एवं समाज को उसकी मूल की ओर मोड़ने का प्रयास किया था। गांधी जी, जिन्हे स्वामी श्रद्धानंद ने ‘महात्मा’ जैसे आदरयुक्त शब्द से संबोधित किया, और जो उनके नाम के साथ नियमित रूप से जुड़ गया, ने उनकी हत्या के दो दिन बाद अर्थात 25 दिसम्बर, 1926 को गोहाटी में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में जारी शोक प्रस्ताव में जो कुछ कहा वह स्तब्ध करने वाला था। महात्मा गांधी के शोक प्रस्ताव के उद्बोधन का एक उद्धरण इस प्रकार है “मैंने अब्दुल रशीद को भाई कहा और मैं इसे दोहराता हूँ। मैं यहाँ तक कि उसे स्वामी जी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता हूँ। वास्तव में दोषी वे लोग हैं जिन्होंने एक दूसरे के विरुद्ध घृणा की भावना पैदा किया। इसलिए यह अवसर दुख प्रकट करने या आँसू बहाने का नहीं है।“ यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वेछा एवं सहमति के पश्चात पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मलखान राजपूतों को शुद्धि कार्यक्रम के माध्यम से हिन्दू धर्म में वापसी कराई। शासन के तरफ से कोई रोक नहीं लगाई गई थी जबकि ब्रिटिश काल था।
यहाँ यह विचारणीय है कि महात्मा गांधी ने एक हत्या को सही ठहराया जबकि दूसरे ओर अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहे। हत्या का कारण कुछ भी हो, हत्या हत्या होती है, अच्छी या बुरी नहीं। अब्दुल रशीद को भाई मानते हुए उसे निर्दोष कहा। इतना ही नहीं गांधी ने अपने भाषण में कहा,”… मैं इसलिए स्वामी जी की मृत्यु पर शोक नहीं मना सकता।…हमें एक आदमी के अपराध के कारण पूरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए। मैं अब्दुल रशीद की ओर से वकालत करने की इच्छा रखता हूँ।“ उन्होने आगे कहा कि “समाज सुधारक को तो ऐसी कीमत चुकानी ही पढ़ती है। स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या में कुछ भी अनुपयुक्त नहीं है।“ अब्दुल रशीद के धार्मिक उन्माद को दोषी न मानते हुये गांधी ने कहा कि “…ये हम पढे, अध-पढे लोग हैं जिन्होने अब्दुल रशीद को उन्मादी बनाया।…स्वामी जी की हत्या के पश्चात हमे आशा है कि उनका खून हमारे दोष को धो सकेगा, हृदय को निर्मल करेगा और मानव परिवार के इन दो शक्तिशाली विभाजन को मजबूत कर सकेगा।“(यंग इण्डिया, दिसम्बर 30, 1926)। संभवतः इन्हीं दो परिवारों (हिन्दू एवं मुस्लिम) को मजबूत करने के लिए गांधी जी के आदर्श विचार को मानते हुए उनके पुत्र हरीलाल और पोते कांति ने हिन्दू धर्म को त्याग कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। महात्मा जी का कोई प्रवचन इन दोनों को धर्मपरिवर्तन करने से रोकने में सफल नहीं हो पाया।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने गांधी से पहले ही अशिक्षा, अस्पृश्यता, भेदभाव, अंधविश्वास, पाखंड आदि के विरुद्ध आर्य समाज के माध्यम से अभियान चलाया। नारी उत्थान पर विशेष ज़ोर दिया। गुजराती होते हुये भी हिन्दी को अपनाने पर ज़ोर दिया। वेदमार्ग पर चलते हुए राजे-राजवड़ों को अपनी कमजोरियों को दूर कर संगठित होने एवं देश की स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने हेतु प्रेरित किया। महर्षि ने सत्य एवं अहिंसा को व्यवहार में लाते हुए वेद संदेश ‘विश्व को श्रेष्ठ बनाओ’ की मशाल लेकर जन-जागृति करते रहे। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना कर महर्षि दयानन्द सरस्वती ने समाज को असत्य छोड़ सत्य को ग्रहण करने की प्रेरणा दी। सर्वप्रथम महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ही शुद्धि कार्यक्रम आयोजित कर देहरादून के एक युवक को वैदिक धर्म में प्रवेश कराया। बाद में स्वामी श्रद्धानन्द ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। गांधी के सेक्युलरिज़्म के हिसाब से यह कार्यक्रम मुस्लिम विरोधी था इसलिए वे स्वामी श्रद्धानन्द के हत्या को न्यायोचित ठहरने लगे।
सत्य और न्याय दोनो शब्द पर्यायवाची हैं। जहां सत्य है, वहीं न्याय है और जहां न्याय है, वहीं सत्य है। फिर गांधी का हत्या को न्योचित ठहरना और हत्यारे को निर्दोष मानना उनके सत्य एवं न्याय के सिद्धान्त के दावे को खोखला साबित करता है। अहिंसा के पुजारी यदि सेक्युलरिज़्म के नाम पर हिंसा को न्यायोचित ठहराएँ तो उनके प्रवचन का क्या अर्थ। गांधी के लिए अपने विचार सही हो सकते हैं लेकिन यह जरूरी तो नहीं की सभी के लिए हों। नाथूराम के अपने विचार थे। देश के धर्म के आधार पर विभाजन की पीड़ा असहनीय थी। मुसलमानों के प्रति विशेष झुकाव के कारण हिन्दू समर्थक गोडसे की गांधी से मतभिन्नता थी। जिसके परिणामस्वरूप गांधी जी हत्या हुई। इस हत्या को भी किसी तरह से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यदि हम गांधी जी के चश्मे से देखे तो नाथूराम को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपने विचार से गोडसे ने भी हिन्दू समुदाय एवं राष्ट्रहित में यह कार्य किया था। उसके समर्थक मूर्ति स्थापित करना चाहते हैं तो क्या समस्या है। यदि स्वामी श्रद्धानन्द का हत्यारा निर्दोष है तो गांधी का हत्यारा भी है। यह तो नहीं हो सकता कि स्वामी जी की हत्या सेक्युलर थी और महात्मा जी कम्यूनल। यह भी नहीं हो सकता कि 2002 के गुजरात के दंगे भीषण सांप्रदायिक थे, लेकिन 1984 के दिल्ली के दंगे मात्र एक पेड़ गिरता है तो पृथ्वी हिलती है। दोनों हत्याएँ विशुद्ध हत्या थीं इसलिए इनका समर्थन नहीं किया जा सकता।
वस्तुतः देश की राजनीति धर्मनिरपेक्षता एवं सांप्रदायिकता के ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई है कि इससे बाहर निकलने को मार्ग नहीं दिखाई दे रहा है। तथाकथित सेक्युलरिज़्म ही पार्टियों को चुनाव जीतने का एक सबसे अच्छा मुद्दा दिखाई देता है। द्वन्द गांधी गोडसे विचारों का है-यही कड़वा सच है। सत्य को स्वीकारने में सत्य की विजय एवं देश का कल्याण निहित है।

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1 प्रतिक्रिया

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pkdubey के द्वारा
December 31, 2014

मैं आप से सहमत हूँ आदरणीय |सादर आभार |


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