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देश के लिए घातक सांप्रदायिक पंथनिरपेक्षता

Posted On: 15 Jul, 2012 में

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भारत एक ऐसा देश है जिसमे उसके नियम-कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से नही लागू होते हैं। उदाहरणस्वरूप, अभी हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति एस॰ रविन्द्र भट्ट व एस॰ पी॰ गर्ग ने एक सोलह वर्षीय मुस्लिम लड़की द्वारा घर से भागकर की गई शादी को इस आधार पर वैध करार दिया कि ‘इस्लाम में राजस्वला होने पर 15 वर्ष की आयु में लड़की शादी कर सकती है’। मुस्लिम पर्सनल कानून के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए अदालत ने याचिकाकर्त्री के अनुरोध पर उसे पति के साथ रहने की अनुमति प्रदान की। देश की सरकार ने विवाह के लिए लड़कों की आयु 21 वर्ष और लड़कियों की 18 वर्ष निर्धारित की है। अदालत के उक्त निर्णय के पश्चात भी क्या शादी के लिए सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम आयु सीमा का कोई औचित्य रह जाता है? यदि एक पंथ के लोगों के मामले में लागू नहीं तो दूसरे के लिए बाध्यकारी क्यों? इस तरह के प्रश्न यद्यपि कि महत्वपूर्ण एवं सामयिक हैं जिनका उत्तर मिलना ही चाहिए, लेकिन ऐसा कभी हो सकेगा, यह असंभव ही लगता है, क्योंकि देश के नीति-नियंता इस तरह के प्रश्नों को ही अनावश्यक एवं सांप्रदायिक मानते हैं। जिस संविधान की तथाकथित पंथनिरपेक्ष दलों द्वारा बात-बात में दुहाई दी जाती है उसी के निर्देशक सिद्धांत में दी गई ‘कालांतर में समान आचार संहिता पर आगे बढ़ने’ की बात पर चुप्पी साध ली जाती है। ‘समान आचार संहिता’ की बात करना भी सांप्रदायिकता की श्रेणी में आ चुका है क्योंकि तथाकथित सेक्युलरिस्ट इसे मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप मानते हैं। उच्चतम न्यायालय ने भी कई अवसरों पर समान आचार संहिता को लेकर आगे बढ़ने का निर्देश दिया है लेकिन सरकार इस विषय पर मौन है। फिर तो देश की अट्ठारह प्रतिशत आबादी के लिए सरकार द्वारा निर्धारित विवाह की न्यूनतम आयु का कोई अर्थ नहीं रह जाता हैं और उच्च न्यायालय का उक्त निर्णय इसी सत्य की पुष्टि करता है। ऐसे में स्वस्थ मातृत्व एवं जनसंख्या नियंत्रण की बात करना बेमानी हैं जब एक समुदाय में लड़कियों की कम उम्र में शादी एवं पुरुषों को चार पत्नी रखने की अनुमति हो।

दूसरी तरफ हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत एक से अधिक शादी नहीं की जा सकती। लेकिन क्या यह विचित्र बात नहीं है कि ऐसे किसी व्यक्ति जिसने एक से अधिक शादी कर ली उसके खिलाफ चार बीबियों वाला मुसलमान पुलिस दारोगा शिकायत होने पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर कोर्ट में पेश करता है और खुद चार शादी (अल्पवयस्क भी अनुमन्य) करने वाला मुस्लिम न्यायाधीश उसके इस कृत्य को दंडनीय अपराध मानते हुए सजा सुनाता हैं। क्या यही है नैसर्गिक न्याय? क्या यही है समानता का व्यवहार जिसकी गारंटी संविधान ने हमें दी है? क्या यही है एक राष्ट्र की परिकल्पना? और यह कैसी है सेक्युलरिस्टों की ‘पंथनिरपेक्षता’ और कैसा है ‘अनेकता में एकता का सिद्धांत’ जिनका परिणामी अन्त विभेदकारी है?

केंद्र सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग के 27 प्रतिशत आरक्षण में अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 प्रतिशत स्थान विगत फरवरी-मार्च में आयोजित पाँच विधान सभाओं के चुनाव तिथि की घोषणा के ठीक चौबीस घंटे पहले शासनादेश जारी कर आरक्षित किया जाना, और इसको देखते हुए समाजवादी पार्टी द्वारा अपने घोषणा-पत्र में मुसलमानों को अलग से 18 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा करना, विशुद्ध रूप से मुस्लिम वोट बैंक सुरक्षित करने का एक क्षद्म-पंथनिरपेक्ष कदम है। केंद्र सरकार के उक्त आदेश के विरुद्ध दाखिल एक याचिका का निपटारा करते हुए आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने माना कि पंथ के आधार पर अल्पसंख्यकों को 4.5 प्रतिशत आरक्षण देना संविधान का उलंघन है। अतएव माननीय कोर्ट ने सरकार के आदेश को निरस्त करते हुए क्रियान्वयन पर रोक लगा दिया। इस फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय गई केंद्र सरकार को वहाँ से भी कोई राहत नहीं मिली। और उल्टे इसके, कोर्ट द्वारा उच्च न्यायालय के फैसले की पुष्टि किया जाना तथा केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए पंथ के आधार पर आरक्षण देने का औचित्य पूछ लिया जाना दर्शाता है कि अधिसंख्य राजनैतिक दल मुस्लिम वोट बैंक के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार हैं, भले ही देश एवं उसके संविधान की कितनी भी क्षति हो। बात यही नहीं रुकी। सेक्युलरिस्टों के स्वयंभू चैम्पियन समाजवादी पार्टी के मुखिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इतने व्याकुल हो गए कि मुसलमानों हेतु अट्ठारह प्रतिशत आरक्षण सुरक्षित करवाने के लिए सविधान संशोधन की मांग कर डाली। केंद्रीय विधि मंत्री भी इस तरह का संकेत दे चुके है। लगता है शाहबानों प्रकरण की पुनरावृति की जाएगी क्योंकि ऐसा करके ही एकमुश्त मुस्लिम वोट बैंक की व्यवस्था सुनिश्चित हो सकेगी। यदि ऐसा हुआ और यही प्रवृत्ति जारी रही तो एक दिन अल्पसंख्यकों द्वारा आबादी के हिसाब से लोकसभा, विधानसभा सहित अन्य संस्थाओं में भी आरक्षण की यदा-कदा की जाने वाली मांग और ज़ोर पकड़ेगी। तब तथाकथित सेक्युलर दल अल्पसंख्यकों के उचित प्रतिनिधित्व एवं पंथनिरपेक्षता के नाम पर वोट बैंक के लालच में संवैधानिक संसोधन द्वारा जन-प्रतिनिधित्व कानून में परिवर्तन सुनिश्चित करने के लिए किसी भी स्तर तक चले जाने में बिलकुल नहीं हिचकेंगे। ऐसी निर्मित स्थिति में, आगे चलकर, शायद यही देश के अगले विभाजन का कारण बने। क्या सत्ता में बने रहने के लिए एक वर्ग विशेष को लाभान्वित/उपकृत करने को ही ध्येय में रखकर शासन चलाने को ‘पंथनिरपेक्षता के नाम पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना’ या, संक्षिप्त में, ‘सांप्रदायिक पंथनिरपेक्षता’ कहना उचित नहीं होगा? यदि हाँ, तो इससे राष्ट्र की अप्रत्याशित क्षति होने वाली है।

देश में हर वर्ग का समान रूप से सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक उन्नति हो इसमे किसी को कोई ऐतराज नहीं हो सकता। सभी को आगे बढ़ने का समान अवसर मिले इससे कोई असहमत नहीं होगा। जो कतिपय कारणो से पिछड़ गए हैं उन्हे संविधान प्रदत्त सुविधा के अंतर्गत मदद दी जाये इसमे भी किसी को कोई ऐतराज नहीं हो सकता। लेकिन इसके इतर पंथ के आधार पर किसी वर्ग विशेष को अन्य नागरिकों की तुलना में अधिक लाभ देना निश्चित रूप से असहमति एवं विरोध को जन्म देता है। अतएव जो भी व्यक्ति या दल ऐसे विचारों से सहमत नहीं हैं वे तथाकथित सेक्युलरिस्टों द्वारा सांप्रदायिक घोषित कर दिये जाते हैं और उनके विरुद्ध अल्पसंख्यकों के मन में घृणा का भाव पैदा कर दिया जाता है।

अब हमे गंभीरता से विचार करना होगा कि क्या सपा सरकार द्वारा उ॰ प्र॰ के वर्ष 2012-13 के बजट मे मुस्लिम कल्याण कार्यक्रमों के लिए अलग से 2500 करोड़ से अधिक धन मंजूर किया जाना, हाई स्कूल पास मुस्लिम लड़कियों को तीस हजार रूपये पढ़ाई/शादी के लिए कन्याधान के रूप स्वीकृत किया जाना, और तो और, मुस्लिम कब्रगाहों को सुरक्षित करने के लिए चाहरदीवारी निर्माण हेतु 250 करोड़ से अधिक धनराशि आबंटित किया जाना आदि किसी प्रकार से पंथनिरपेक्ष कदम परिलक्षित होता है? क्या ममता बनर्जी द्वारा बंगाल में 30 हजार मौलबियों को उनके सामाजिक एवं आर्थिक को ध्यान रखते हुए प्रतिमाह 2500 रुपये मानदेय दिया जाना पंथनिरपेक्ष निर्णय है? केंद्र सरकार द्वारा सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर देश में सभी हाई स्कूल उत्तीर्ण मुस्लिम लड़कियों को साईकिल देने का निर्णय लेना, विदेश में पढ़ने वाले मुस्लिम छात्रों को ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराने तथा भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रारम्भिक (प्री) परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले मुस्लिम प्रतियोगियों को आर्थिक पैकेज देने का कार्यक्रम बनाना, क्या किसी भी दृष्टिकोण से पंथनिपेक्ष लगता है? कदापि नहीं, क्योंकि पंथ के आधार पर किसी एक विशेष समुदाय को लाभान्वित करना सेक्युलरिज़्म के सिद्धान्त “स्टेट (राज्य) पंथ के आधार पर नागरिकों से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा” के सर्वथा विपरीत है। ऐसा लगता है कि तथाकथित सेक्युलरिस्ट दलों ने पंथ के आधार पर एक वर्ग विशेष को वोट के बदले उपकृत करने को ही पंथनिरपेक्षता मान लिया है, और दूसरी तरफ अन्य पंथ के अनुयायियों की हाई स्कूल पास लड़कियों को कन्याधन एवं साईकिल वितरण, पुजारियों को मानदेय तथा अन्य छात्रों को ब्याजमुक्त शिक्षा ऋण और प्रतियोगी परीक्षा के लिए विशेष आर्थिक पैकेज देना सांप्रदायिक। पंथ के आधार पर इस तरह का भेदभाव निश्चितरुप से असंतोष उत्पन्न करने वाला है जिसकी परिणति देश के लिए घातक हो सकती है।

यद्यपि की देश के अल्पसंख्यकों के में सिक्ख, ईसाई, बौद्ध और जैन भी आते हैं लेकिन शायद ही कभी किसी सरकार ने उनके सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए मुसलमानों की तरह अलग से कार्यक्रम बनाए हो और उसके के लिए बजटीय प्रावधान किया हो। ऐसा केवल संख्याबल को देखकर कर किया जाता है। मुसलमानो की अट्ठारह प्रतिशत जनसंख्या किसी भी दल को सत्ता की कुर्सी तक पहुचाने के लिए पर्याप्त है। इनका वोटिंग पैटर्न प्रायः एकमुश्त का होता है। ये उसी दल के प्रत्याशी के साथ संजीदगी से खड़े होते हैं जो गैर-पंथनिरपेक्ष दल (तथाकथित सेक्युलरिस्टों द्वारा घोषित) के प्रत्याशी को हरा सके। यह इसी एकमुश्त वोट बैंक का तकाजा है कि वर्तमान केंद्र सरकार सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग के माध्यम से अपने को मुसलमानों की सबसे बड़ी हितैषी सिद्ध में लगी हुई है। लक्ष्य है 2014 लोकसभा चुनाव पश्चात सत्ता में वापसी। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की आड़ में देश के जिलों को मुस्लिम बाहुल्य, गैर-मुस्लिम बाहुल्य में बांट कर किस पंथनिरपेक्षता का परिचय देना चाहती है? क्या उसी पंथनिरपेक्षता का परिचय देना चाहती है जिसका महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन देकर किया, जिसके परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग का उदय और जिन्ना का कांग्रेस से मोह भंग होकर उससे जुड़ जाना हुआ, और अन्त में, देश का विभाजन?

अल्पसंख्यकों, विशेष तौर से मुसलमानों, के साथ खड़े दिखने वाले दलों को कभी भी कश्मीरी पंडितों, जो कि जम्मू एवं कश्मीर राज्य के अल्पसंख्यक हैं, के पक्ष में एक भी शब्द बोलते नहीं पाया गया। यह सर्वविदित है कि कश्मीरी पंडितों को राज्य के बहुसंख्यक मुसलमानो द्वारा बाहर खदेड़ कर घर-द्वार, जायदाद एवं पूजा स्थलों पर कब्जा कर लिया गया। जब उनके जान-माल का खतरा काफी बढ़ गया और बहू-बेटियों के साथ दुर्व्यवहार असहनीय हो गया तब उन्हे अपना सबकुछ छोडकर पलायन करने के लिए विवश होना पड़ा। परिणामस्वरूप, दो दशक से अधिक समय से वे अपने ही देश में शरणार्थी शिविरों में नारकीय जीवन बिता रहे हैं। कहाँ हैं उस महान सेक्युलर पार्टी की अध्यक्षा जो बटला हाउस मुठभेड़ का वीडियो देखकर तो रो पड़ी थीं लेकिन कश्मीरी पंडितों की अपने ही देश में ऐसी दुर्दशा पर कम से कम संवेदना प्रगट करने के लिए भी उनके पास दो शब्द नहीं हैं? जब दोनों अल्पसंख्यक हैं तो समान व्यवहार क्यों नहीं? इसका उत्तर स्वतः स्पष्ट है: कश्मीरी पंडित हिन्दू अल्पसंख्यक है। साथ ही, क्या कोई बता सकता है कि धारा-370, जो संविधान की एक अस्थायी व्यवस्था है, को हटा कर जम्मू एवं कश्मीर को अन्य राज्यों की स्थिति मंव ला देना किसी प्रकार से सांप्रदायिक कृत्य हो सकता है? इससे देश के मुसलमानों का क्या अहित होगा-यह समझ से परे है। किसी राज्य को विशेष दर्जा देने वाली इस भेदभावपूर्ण धारा से पंथनिरपेक्षता का क्या संबंध है? इसे तो देश की तथाकथित सेक्युलर जमात ही बता सकती है क्योंकि वे ही इसको समाप्त किए जाने की मांग को सांप्रदायिक मानते हैं। यह वही जमात है जो सांप्रदायिक दंगो के बीच भी भेदभाव करती है: गुजरात के 2002 के दंगे को लेकर पिछले एक दशक से देश-विदेश में हर मंच पर हाय-तौबा मचाए हुए है लेकिन 1984 के सिक्ख दंगे पर जबान नहीं खोलती जबकि प्रत्येक दंगा निंदनीय होता है। यही जमात गोधरा में रामभक्तों की ट्रेन कोच में जलकर हुई मृत्यु की घटना को स्वरचित खडयंत्र मानती है। इस तरह की मानसिकता एवं सोच जिसे पंथनिरपेक्षता की आड़ में कार्यरूप में परिवर्तित कर सेक्युलरिस्ट स्वार्थवश एक वर्ग विशेष की खुलकर हिमायत करते है, वास्तविक सांप्रदायिकता हैं। अब तो ऐसी पंथनिरपेक्षता से सतर्क रहने की आवश्यकता है जो सांप्रदायिकता से भी घातक हो चुकी है।

इस बात से सभी सहमत होंगे कि भारत की पहचान राम, कृष्ण, गुरुनानक, महात्मा बुद्ध और महावीर जैन से होती है न कि इस्लाम एवं ईसाइयत से। यह भी सत्य है कि राम एवं कृष्ण हमारे पूर्वज हैं और हम सभी उनकी संतान हैं, भले ही हममे से बहुतों ने कालांतर में भय या प्रीति के कारण हिंदुइज़्म के अलावा अन्य कोई पंथ अपना लिया हो। लेकिन तथाकथित सेक्युलरिस्टों की दृष्टि में राम एवं कृष्ण का नाम लेना भी सांप्रदायिक है। अयोध्या एवं मथुरा में राम और कृष्ण की जन्मभूमि के अस्तित्व को मानना सांप्रदायिक लेकिन बाबरी मस्जिद एवं कृष्ण जन्मस्थल पर तामीर मस्जिद पंथनिरपेक्षता की प्रतीक। महाराणा प्रताप एवं शिवाजी सांप्रदायिक लेकिन मानसिंह एवं अकबर सेक्युलर। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में मुस्लिम पुलिस अधिकारी की नियुक्ति का आदेश पंथनिरपेक्ष लेकिन ऐसे विघटनकारी आदेश का विरोध सांप्रदायिक। केंद्र सरकार के नेहरू युवा केंद्र संगठन एवं सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट (सहमत) द्वारा संयुक्तरूप से आयोजित प्रदर्शिनी में सीता जी को राम की बहन बताना पंथनिरपेक्ष एवं विरोध सांप्रदायिक। केंद्र सरकार द्वारा घोषित 14 दिन के राजपत्रित अवकाश में मुस्लिम एवं ईसाई त्योहारों की संख्या अधिक होना पंथनिरपेक्ष, कम होना सांप्रदायिक, यद्यपि की कभी कम नहीं होता। उदाहरण के लिए, वर्तमान वर्ष 2012 में छूटियों की सूची में ईदुल-फ़ित्र, ईदुल-जुहा, मोहर्रम तथा ईद-ए-मिलाद सहित मुसलमानो के चार, क्रिसमस डे एव गुडफ्राईडे, इसाइयों के दो और विजयदशमी तथा दीपावली, हिंदुओं के मात्र दो अवकाश रखना पंथनिरपेक्षता का उत्कृष्ट नमूना है। इस तरह के अनेक उदाहरण मौजूद हैं जो यह बताने को काफी हैं कि किस तरह अल्पसंख्यकों का वोटबैंक पुख्ता करने के लिए पंथनिरपेक्षता के नाम का चोला पहन कर सांप्रदायिकता का गंदा खेल खेला जा रहा है।

अन्त में, उक्त विश्लेषण के पश्चात इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुँच जा सकता है कि भारतीय राजनीति का वास्तव में पंथनिरपेक्ष और गैर-पंथनिरपेक्ष (सांप्रदायिक) नहीं बल्कि पंथनिरपेक्ष और क्षद्म-पंथनिरपेक्ष के रूप में ध्रुवीकरण हो कर चुका है जो आने वाले दिनो में देश के लिए काफी घातक सिद्ध हो सकता है। देश की वर्तमान राजनीति में अल्पसंख्यक वोट के लिए विभिन्न दलों में जबरदस्त ज़ोर-आजमाइस चल रही है। सत्ता लाभ के लिए पंथनिरपेक्षता की आड़ में अल्पसंख्यकवाद पोषित सांप्रदायिकता को खुलकर बढ़ावा दिया जा रहा है जोकि एक आत्मघाती कदम है। इसलिए अब इस विषय पर खुली बहस छेड़ने की जरूरत है ताकि वे लोग बे-नकाब हो सकें जो निहित स्वार्थवश पंथ के आधार पर समाज एवं राष्ट्र को विभाजित करने का प्रयास कर रहे हैं।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jagojagobharat के द्वारा
July 18, 2012

यह इस देश का दुर्भाग्य है की संविधान का खुलेआम उलंघन किया जाता है वोट बैंक की राजनीती के तहत और हम मूक दर्शक बन देखते रह जाते है हमारी आस्थाओ के साथ खिलवाड़ किया जाता है लेकिन हम कुछ नहीं कर पाते क्योकि हमें सांप्रदायिक घोषित कर दिया जाता है .इस मुद्दे को उठाने के लिए आभार बहुत सुन्दर आलेख

pritish1 के द्वारा
July 17, 2012

आपके विचार सत्य हैं………हमारी प्रस्तावना में है भारत में सब सामान है सबको सामान अधिकार है किन्तु बाद में उसका खंडन है मुस्लिमों के लिए इतना आरक्षण st /sc के लिए इतना आरक्षण और यही सब फिर हम भारतीय एक कैसे हैं……….? हमारे संविधान ने ही हमें बाँट दिया है फिर इस देश का विकाश कैसे संभव होगा………..और परिणाम वर्त्तमान देश की दुर्गति है……..और आने वाले दिनों में और घटक परिणाम आयेंगे…….!


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