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कहाँ है लोकतन्त्र? कैसा लोकतन्त्र?

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लोकसभा की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर 13 मई, 2012 को सेंट्रल हाल में दोनों सदनों की विशेष संयुक्त बैठक बुलाई गई थी।इस विशेष कार्यक्रम में पक्ष एवं प्रतिपक्ष के विभिन्न नेताओं ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए यह प्रसन्नता व्यक्त की कि इन साठ वर्षों में हमने लोकतन्त्र को बचाए रखा। लेकिन कहाँ है लोकतन्त्र? कैसा लोकतन्त्र? इन प्रश्नों का उत्तर कौन देगा? वे पार्टियाँ जिनका खुद का आधार ही लोकतान्त्रिक नहीं है। देश के अधिकांश राजनैतिक दल, चाहे वे राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय, आंतरिक लोकतन्त्र से कोसों दूर हैं। फिर उनके मुंह से अपने को लोकतन्त्र का प्रहरी बताना एक घटिया मज़ाक के सिवाय कुछ नहीं हैं। इस विषय पर आगे बढ़ने पर स्पष्ट होता है कि अधिकतर दल परिवार या व्यक्ति के पीछे चल रहे हैं, जैसे कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार, डीएमक-करुणानिधि, एआइडीएमके-जयललिता, राजद-लालू प्रसाद यादव, सपा-मुलायम सिंह यादव, शिवसेना-बाल ठाकरे, नेशनल कान्फ्रेंस-फारुक अब्दुल्ला, एनसीपी-शरद पवार, अकाली शिरोमणि दल-प्रकाश सिंह बादल, राष्ट्रीय लोक दल-चौधरी अजित सिंह, जनता दल (एस)-देवगौड़ा, बसपा-मायावती, तृणमूल कांग्रेस-ममता बनर्जी आदि। इन दलों का वजूद केवल परिवार या व्यक्ति के नाते है, इसमे कोई संदेह नहीं। ऐसी स्थिति में इन पार्टियों में आंतरिक लोकतन्त्र की कल्पना करना दिवास्वप्न देखने जैसा है। फिर भी हमारे नेता कई बार सदन के अंदर और बाहर अन्ना हज़ारे के लोकपाल आंदोलन के संदर्भ में कहते सुने गए कि सांसद होने के नाते वही लोकतन्त्र के सबसे बड़े पहरेदार हैं। वास्तविकता तो यह है कि इस देश में लोकतन्त्र पर वंशवाद हाबी है जिसके कारण लोकतन्त्र की जड़ें कमजोर होती जा रहीं हैं। बस्तुतः देश में आज भी राजवंशीय परंपरा ही लागू है; फर्क बस इतना ही है कि तब राजसिंघासन पर बैठते थे और राजसी पोशाक पहनते थे, और अब, कुर्सी पर बैठते हैं, कुर्ता-पाजामा पहनते हैं और टोपी लगाते हैं।
यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि नेहरू-गांधी परिवार के सम्मोह में भारतीय राजनीति में ‘..वाद’ नामक बुराई लाने वाली पार्टी कांग्रेस ही है। फिर तो यह सोचा भी नहीं जा सकता है कि नेहरू-गांधी परिवार या सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बिना कांग्रेस का कोई अस्तित्व हो सकता है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक इसी परिवार के लोगों ने सबसे ज्यादा समय तक देश पर शासन किया है। वंशानुक्रम में अब राहुल गांधी का अगला प्रधानमंत्री होना निश्चित है। जबकि ऐसे महत्वपूर्ण पद पर अनुभव, वरिष्ठता एवं योग्यता के आधार पर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के अनुसार चयन होना चाहिए। यदि यह पैमाना अपनाया जाये तो राहुल गांधी से बेहतर कई नेता पार्टी में मौजूद हैं। एक खानदान की पार्टी होने के कारण इस बारे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, इन्दिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक प्रधानमंत्री एवं पार्टी अध्यक्ष दोनों पद एक ही व्यक्ति के पास रहा। सीताराम केसरी के कार्यकाल वर्ष 1997-98 को छोड़ दें तो तब से लेकर आजतक सोनिया गांधी ही पार्टी अध्यक्ष हैं। प्रधानमंत्री न होते हुए भी एनएसी अध्यक्ष (उन्ही के लिए विशेष रूप से सृजित) के वैधानिक पद पर रहते हुए सुपर प्रधानमंत्री के रूप में कार्य कर रहीं हैं। परिणामतः सत्ता की कमान उन्ही के पास है। मनमोहन सिंह तो नाम के प्रधानमंत्री हैं क्योंकि उन्हें हर बात में मैडम से अनुमति लेनी पड़ती है। ‘हाई कमान्ड’ जैसे शब्द का प्रयोग कांग्रेस पार्टी में इन्दिरा गांधी के समय से आजतक बदस्तूर चल रहा है। इस शब्द के सुनने मात्र से ही ‘अधिकारवादी/सत्तावादी व्यक्ति’ के भाव का आभास होता है।
ठीक इसी तरह अन्य राजनीतिक दल भी कांग्रेस के ही नक्शे-कदम पर चल रहे हैं। उनमे भी पार्टी के मायने परिवार और व्यक्ति ही है। सपा को ही लें, इस पार्टी के लगभग सभी खास पद इसी परिवार के पास है। मुलायम सिंह यादव का पूरा कुनबा- भाई, भतीजा, बेटा आदि मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक के रूप में राजनीति में ही हैं क्योंकि यह उनका पेशा बन चुका है। क्या बसपा में मायावती के अलावा किसी अन्य के वजूद की कल्पना की जा सकती है? बिल्कुल नहीं। ममता बनर्जी ने अभी हाल ही मे दिनेश त्रिवेदी को, उन्हे बिना सुने, रेल मंत्री के पद से हटवा कर यह आभास करवा दिया कि पार्टी में कितना आंतरिक लोकतन्त्र है। शिरोमणि अकाली दल में प्रकाश सिंह बादल के पुत्र सुखबीर सिंह बादल ही उप मुख्यमंत्री होगे क्योंकि वे वंशानुक्रम में ठीक उसी तरह से है जैसे मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री, उ॰ प्र॰, डॉ॰ फारुख अब्दुल्ला के बेटे उम्र अब्दुल्ला, मुख्यमंत्री, जम्मू और कश्मीर। शायद राजद में राबड़ी देवी से ज्यादा कोई योग्य व्यक्ति नहीं था जो लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाला प्रकरण में जेल जाने के बाद मुख्यमंत्री का पद सम्हालता। इसीलिए तो लालू जी ने अपना राज-पाट और मुख्यमंत्री पद पार्टी हित में अपनी निरक्षर पत्नी को सौंपकर जेल जाना उचित समझा। पार्टियों में आंतरिक लोकतन्त्र का इससे बड़ा नमूना कहाँ मिलेगा! बावजूद इन सबके भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, जनता दल (युनाइटेड) आदि जैसी कुछ पार्टियां है जो किसी परिवार या व्यक्ति के पीछे नहीं चलती हैं। इसी कारण इनमे अभी कुछ हद तक आंतरिक लोकतन्त्र बचा हुआ है। यद्यपि कि इन दलों में अंदरूनी तौर पर चर्चा, बहस, तर्क आदि करने की पूरी छूट है और जिसके आधार पर प्रायः सामूहिक निर्णय लिए जाते हैं फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि भाई-भतीजावाद से अछूते हैं।
हमारे राजनीतिक दल अपनी अच्छाइयों को जनता को बताने में एड़ी से चोटी की ताकत झोंक देते हैं लेकिन कभी भी अंदरूनी लोकतंत्र की जिक्र तक नहीं करते क्योंकि उन्हे हमेशा डर बना रहता है कि ऐसा करने से कहीं पार्टी पर उनके परिवार की पकड़ कमजोर न हो जाये। अतएव आशिकांश राजनीतिक दल ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनी’ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। और जब राजनैतिक दल बनाना एक लाभकारी एक उदद्योग बन गया हो तब मतदाताओं का उनसे आत्म-नियमन एवं आंतरिक लोकतन्त्र की उम्मीद करना अपने को धोखे में रखना है।
लगभग सभी दलों द्वारा चुनाव में स्टेट फंडिंग की मांग की जाती रही है। इस बारे में मुख्य चुनाव आयुक्त का स्पष्ट कहना है कि पहले राजनीतिक पार्टियाँ अपने अंदर आंतरिक लोकतन्त्र लाएँ तथा वित्तीय लेखा-जोखा को पारदर्शी बनाएँ तभी इस विषय पर आगे विचार किया जा सकता है। उन्हे ऐसा इसलिए कहना पड़ा क्योंकि अनेक दलों द्वारा प्रत्याशियों का चयन लोकतान्त्रिक तरीके से नहीं किया जाता है। परिवार और व्यक्ति केन्द्रित होने के नाते टिकट वितरण में धनबल एवं भाई-भतीजावाद का बोलबाला रहता है। राहुल गांधी ने भी माना की भारत के राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतन्त्र नहीं है। इसलिए यदि पहुँच नहीं है तो चुनाव नहीं लड़ सकते। इसी संदर्भ में मारग्रेट अल्वा ने गुब्बार निकालते हुए कहा कि कांग्रेस में टिकट बेंचा गया और उनका इशारा दिग्विजय सिंह, स्क्रीनिंग कमेटी चेयरमन की ओर था। यह खुला सत्य है कि दिग्विजय सिंह 10, जनपथ के वफादार सिपाही और विशेषरूप से राहुल गांधी के विश्वासपात्र हैं। इस प्रकरण से प्रतिध्वनित होता है कि मारग्रेट अल्वा पूरी दुनियाँ को बताना चाह रहीं रहीं थीं कि भाई-भतीजावाद कांग्रेस के प्रथम परिवार के मामले में ठीक है लेकिन अन्य नेताओं के लिए नहीं। तो फिर क्यों न इसे नेहरू-गांधी परिवार के ‘फेमिली वैल्यू’ के रूप में लिया जाय?
वंश एवं व्यक्ति आधारित दलों में नेताओं की निष्ठा परिवार या व्यक्ति के प्रति होती है न कि सिद्धांत एवं दल के प्रति। अपनी निष्ठा को सिद्ध करने के लिए नेता उस परिवार या व्यक्ति के साथ समर्पण भाव से जुड़े रहते है ताकि कोई मौका हाथ से निकलने न पाये। उदाहरणस्वरूप उस क्षण को स्मरण करें जब 2004 में सरकार बनाने के लिए प्रधानमंत्री पद हेतु नेता का चयन करने के लिए कांग्रेस द्वारा बुलाई गयी बैठक में पार्टी के अनेक बरिष्ठ नेता सोनिया गांधी के इंकार करने बाद किस तरह रो-रोकर गिड़गिड़ाते हुए उन्हे प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने हेतु मनाने में लगे हुए थे। कुछ तो एक कदम आगे बढ़कर उन्हे मनाने के लिए रोते हुए उनके पैरों में गिर पड़े। टीवी चैनलों पर बैठक का सीधा प्रसारण देखकर लगा कि शायद ही दुनिया में चाटुकारिता की इस तरह की कोई और मिसाल हो। वंशवाद एवं व्यक्तिवाद की पोषक पार्टियाँ हमेशा चाटुकार नेताओं से घिरी रहती हैं। परिणामतः पार्टी में किन्तु-परन्तु करने वालों के लिए कोई स्थान नहीं होता है। फिर क्या, राजशाही भाव के साथ पार्टी और सरकार चलायी जाती है। योग्यता, पार्टी एवं सिद्धांतों के प्रति सच्ची निष्ठा के स्थान पर चाटुकारिता, धनबल, भाई-भतीजाबाद को आधार बनाकर पार्टी में पद, टिकट और सरकार में बांछित स्थान दिये जाते हैं। और बदले में देश की जनता को देखने को मिलता है नेताओं द्वारा राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर किए गए नित नये घोटाले ही घोटाले। कोई अपनी मूर्ति बनवाता है, 80-90 लाख हाथी की एक मूर्ति पर खर्च करता है, कोई केवल सैफई पर ध्यान देता है, कोई केवल रायबरेली एवं अमेठी के विकास को ही समूचे राष्ट्र का विकास मानता है, रायबरेली में एम्स नहीं तो उ॰ प्र॰ में एम्स नहीं पर चार साल तक अड़ा रहता है आदि। परिवार एवं व्यक्तिवादी पार्टियाँ चुनाव बाद सरकार बनाने और सरकार बचाने में सहयोग करने के लिए सौदेबाजी करती और मुहमांगा पैसा वसूलती हैं। रालोद के मुखिया अजित सिंह का उदाहरण सबके सामने है। पद के लिए हमेशा बिकने को तैयार रहते है। मुलायम-मायावती कांग्रेस की सरकार बचाने एवं आय से अधिक धन के मामले की दुरभि संधि जगजाहिर है। शून्य के साथ राजनीति में प्रवेश करने वाले नेता आज जनता का पैसा लूटकर सैकड़ों करोड़ रुपये के मालिक बन बैठे हैं। क्या यही है लोकतन्त्र का रक्षक बनने का मापदंड?
भारत में लोकतन्त्र की जड़ें हजारों वर्ष पुरानी हैं। शाक्य और लिच्छवि गणराज्य इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। शाक्य परिषद में 500 सदस्य होते थे। इस परिषद का अध्यक्ष राजा होता था। कोई निर्णय विशेषज्ञों एवं विशिष्ट जनो द्वारा विचार-विमर्श करके लिया जाता था। लिच्छवि गणराज्य के राज्य परिषद में 7707 सदस्य होते थे। वैदेशिक नीति तथा प्रशासन चलाने के लिए समितियां गठित थीं जो लोकतान्त्रिक आधार पर कार्य करती थीं। उस काल में सही मायने में लोकतन्त्र था। फिर हमारे नेता यह क्यों बार-बार कह कर गुमराह करते है कि लोकतन्त्र उन्ही के नाते बचा हुआ है जबकि लोकतन्त्र को अक्षुण रखने में सर्वाधिक योगदान देश के नागरिकों का है। भारत की जींस में ही लोकतन्त्र है। देश में लोकतन्त्र को वास्तविक खतरा परिवार एवं व्यक्तिवादी दलों से है जो आंतरिक लोकतन्त्र को नकारते है। सारभौमिक सत्य तो है मानव जन्म से ही लोकतान्त्रिक प्रवृत्ति का होता है।
अन्त में, यह कैसा लोकतन्त्र है जिसमे राजनैतिक दल लोकतन्त्र के महापर्व ‘चुनाव’ में लोकतन्त्र के नाम पर बढ़-चढ़कर भाग तो लेते हैं लेकिन अपनी पार्टी में आंतरिक लोकतन्त्र के लिए कदापि तैयार नहीं। फिर तो मन-मस्तिष्क में यह प्रश्न बार-बार उठना लाजिमी है कि कहाँ है लोकतन्त्र? कैसा लोकतन्त्र?

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आर.एन. शाही के द्वारा
May 18, 2012

निरंतर बढ़ते वंशवाद की गोद में खेलते भारतीय लोकतंत्र की अच्छी बखिया उधेड़ी है आपने. एक और परिपक्व पोस्ट की बधाइयां स्वीकार करें.

yogi sarswat के द्वारा
May 18, 2012

यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि नेहरू-गांधी परिवार के सम्मोह में भारतीय राजनीति में ‘..वाद’ नामक बुराई लाने वाली पार्टी कांग्रेस ही है। फिर तो यह सोचा भी नहीं जा सकता है कि नेहरू-गांधी परिवार या सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बिना कांग्रेस का कोई अस्तित्व हो सकता है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक इसी परिवार के लोगों ने सबसे ज्यादा समय तक देश पर शासन किया है। वंशानुक्रम में अब राहुल गांधी का अगला प्रधानमंत्री होना निश्चित है। जबकि ऐसे महत्वपूर्ण पद पर अनुभव, वरिष्ठता एवं योग्यता के आधार पर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के अनुसार चयन होना चाहिए। यदि यह पैमाना अपनाया जाये तो राहुल गांधी से बेहतर कई नेता पार्टी में मौजूद हैं। एक खानदान की पार्टी होने के कारण इस बारे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, इन्दिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक प्रधानमंत्री एवं पार्टी अध्यक्ष दोनों पद एक ही व्यक्ति के पास रहा। सीताराम केसरी के कार्यकाल वर्ष 1997-98 को छोड़ दें तो तब से लेकर आजतक सोनिया गांधी ही पार्टी अध्यक्ष हैं। लोकतंत्र का बेडा गर्क तो नेहरु के प्रधानमंत्री बनने से ही शुरू हो गया था ! क्योंकि उस वक्त नेहरु से भी कई योग्य व्यक्ति मैदान में थे किन्तु गाँधी के प्रिय होने के नाते नेहरु को वरीयता दी गई ! हम इसे लोकतंत्र नहीं कह सकते ये केवल एक परिवार का राजतन्त्र है जो अपने आप को इस देश की गरीब जनता का हितेषी दिखाकर , इस देश को लूट रहा है ! बेहतरीन लेख सिंह साब !

jlsingh के द्वारा
May 17, 2012

यह कैसा लोकतन्त्र है जिसमे राजनैतिक दल लोकतन्त्र के महापर्व ‘चुनाव’ में लोकतन्त्र के नाम पर बढ़-चढ़कर भाग तो लेते हैं लेकिन अपनी पार्टी में आंतरिक लोकतन्त्र के लिए कदापि तैयार नहीं। फिर तो मन-मस्तिष्क में यह प्रश्न बार-बार उठना लाजिमी है कि कहाँ है लोकतन्त्र? कैसा लोकतन्त्र? डॉ. साहब आपकी एक एक बात सही है. केवल ढोंग है. और अपने मुंह मिया मिट्ठू बनाए जैसा या मजमा दिखा था. सारगर्भित लेख के लिए बधाई!

bharodiya के द्वारा
May 17, 2012

डॉ साहब आप की एक एक बात सही है । आज लोकशाही जीस रूपमें है उसे देख कर लगता है ईस से तो राजा शाही अच्छी थी । पिछले साल एक पत्रकारने एक १२७ साल की माता जी को राजकारण पर सवाल किया था । उस ने इतना ही बताया – राज तो राणा का –। मतलब की लोकशाही से वो छोटा राजा अच्छा था जीसे वो राणा कहती थी । भले वो राणा अन्ग्रेज का गुलाम रहा हो । ये बात अपने सवा सौ साल के जीवन के अनूभव पर कही थी । लोकशाही राज करने का एक प्रकार मात्र है । कोई भी शाही हो, तानाशाही, सैनिकशाही या लोकशाही, यदी शाह ही प्रजा या राष्ट्रप्रेमी ना हो तो वो शाही किसी काम की नही । तानाशाह अगर प्रजाप्रेमी हो तो तानाशाही अच्छी, यदी सैनिक देशप्रेमी हो और वो सैनिक शाही लाये तो वो भी अच्छा है । हमारी जनरेशन के आगे लोकशाही के गाने गा गा कर एक माहोल बनाया गया । लोकशाही बचाओ, लोकशाही बचाओ । प्रजा को बचाओ या देश को बचाओ कोइ नही कहेगा । लोकशाही किस के लिए है । प्रजा के लिए । और प्रजा को कहा जाता है लोक शाही बचाओ । अगर लोकशाही में ही अपना बचाव करने की क्षमता ना हो तो वो प्रजा का कल्याण क्या करेगी । जनता को एक अच्छी सी शाही की जरूरत है । भारत की लोकशाही जैसी घटिया लोकशाही से ईतराने की बिलकूल जरूरत नही है ।


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