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राजनैतिक भ्रष्टाचार की बलि चढ़ता उ॰ प्र॰ में प्रस्तावित एम्स

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इस समय देश में भ्रष्टाचार को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की जंग छिड़ी हुई है चाहे वह लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, मीडिया हो या जनता के बीच मजबूत लोकपाल एवं लोकायुक्त संस्थाओं के गठन और काले धन को लेकर अन्ना एवं स्वामी रामदेव के नेतृत्व में अभियान। यह निश्चित तौर कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचाररूपी दीमक इस देश की जड़ों को खोखला किये जा रहा है जिसका परिणाम है कि हम विकास की उस ऊंचाई को छूने में अभी तक असफल रहें हैं जहां तक दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अन्य देश पहुँच चुके हैं जबकि हम भी लगभग उसी के आस-पास स्वतंत्र हुए। जापान इसका सटीक उदाहरण है। अभी भी हम अशिक्षा, गरीबी एवं भुखमरी के शिकार बने हुए हैं। ट्रांसपरेंसी इन्टरनेशनल के अनुसार 183 देशों की सूची स्केल 0 से उत्कृष्ट 10 में भारत का सूचकांक 3.3 से गिरकर 3.1 हो गया है और भ्रष्टाचार की अन्तर्राष्ट्रीय रैंकिंग में 87 से गिरकर 95वें स्थान पर पहुँच गया है। वैसे तो भ्रष्टाचार के प्रकार कई हैं लेकिन सबका मूल राजनैतिक भ्रष्टाचार ही है जिसके कारण देश इस स्थिति में पहुँच चुका है। इसका एक सटीक उदाहरण है उत्तर प्रदेश में एम्स सरीखे चिकित्सा संस्थान हेतु स्थल चयन का मामला जो कि केंद्र एव राज्य सरकार के बीच विगत कई वर्षों से उलझा हुआ है।
भारत सरकार ने वर्ष 2009-10 में प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (पीएमएसएसवाई) के अन्तर्गत प्रथम चरण में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स)), जैसे छह संस्था न, बिहार (पटना), मध्य प्रदेश (भोपाल), उड़ीसा (भुवनेश्वर), राजस्थान (जोधपुर), छत्तीसगढ़ (रायपुर) और उत्तरांचल (ऋषिकेश) में खोले जाने हेतु स्वीकृति प्रदान की। दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल को भी एक-एक एम्स जैसे संस्थान (एम्स लाइक इंस्टीट्यूशन) की स्वीकृति देते हुए आगे की कार्यवाही हेतु दिशानिर्देश भेजे गए। इसी क्रम में केंद्र द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार से रायबरेली में संस्थान हेतु 150 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने हेतु अनुरोध किया गया। करीब तीन वर्ष से ज्यादा समय बीत गया लेकिन स्थिति यथावत बनी हुई है जबकि प्रथम चरण के लगभग सभी संस्थानो मे वर्ष 2012-13 से चिकित्सा अध्ययन का प्रथम सत्र शुरू होने जा रहा है।
केंद्र सरकार किसी भी सूरत में श्रीमती सोनिया गांधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली के लालगंज में एम्स खोलना चाहती है जबकि मायावती इसे बुंदेलखंड में चाहती थीं। तत्कालीन राज्य सरकार का यह तर्क कि लखनऊ में संजय गांधी स्नाकोत्तर चिकित्सा संस्थान, जो कि एम्स जैसा ही है, प्रस्तावित स्थल के निकट है, बिल्कुल सत्य है, और इस बात में पूरा वजन है कि एक स्तर के दो संस्थान अगल-बगल में स्थापित हों इसका कोई औचित्य नहीं बनता। फिर भी मायावती सरकार का भी बुंदेलखंड में एम्स खोलने की मंशा के पीछे वही अभिप्राय था जो कांग्रेसनीत केंद्र सरकार का रायबरेली में। इन दोनों सरकारों का प्रदेश की जनता के स्वास्थ्य संबन्धित विषयों से न तो कोई सरोकार था और न ही है। इसके स्पष्ट उदाहरण हैं गोरखपुर एवं आस-पास के जनपदों में इन्सेफ़्लाइटिस जैसी घातक बीमारी पर नियंत्रण हेतु कांग्रेस महासचिव श्री राहुल गांधी एवं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री गुलाम नबी आज़ाद के आश्वासनों के पश्चात भी किसी कार्यवाही का न होना तथा मायावती सरकार के दौरान एनएचआरएम घोटाला जिसमे दो मुख्य चिकित्सा अधिकारियों एवं एक उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी को अपनी जान गंवानी पड़ी। बसपा सरकार ने केंद्र के बुंदेलखंड में बढ़ते कदम के प्रभाव को रोकने के लिए ताकि उसका वोटबैंक अक्षुण रहे, प्रदेश में अन्य कोई स्थल नहीं सुझाया। परिणामतः आपसी खींच-तान के कारण पूर्णत केंद्रीय सहायता रूपये 823 करोड़ से तैयार होने वाले एम्स का राज्य से बाहर अन्यत्र स्थानान्तरण की संभावना बनती दिख रही है।
एम्स जैसे संस्थान के लिए स्थल चयन करने हेतु केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा कुछ मापदण्ड जरूर तय किये गए होंगे जिनके अनुसार यह कार्य बहुत पहले सम्पन्न हो जाना चाहिए था। यद्दपि कि बीस करोड़ आबादी के प्रदेश के लिए कम से कम ऐसे चार विशेषज्ञतापूर्ण संस्थानो की आवश्यकता है फिर भी जो हमें पहले मिला है उसके लिए सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक, जनसांख्यकीय एवं स्वास्थ्य सेवा उपलब्धता के मापदण्डों के आधार पर उपयुक्त स्थल चयन कर जमीन उपलब्ध करा देने की आवश्यकता थी। यदि ऐसा हुआ होता और राजनैतिक भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़ा होता तो अबतक तो स्थापना कार्य पूर्णता के करीब होता।
इस विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए यह विचार करना आवश्यक है कि प्रस्तावित एम्स की स्थापना रायबरेली में ही क्यों? इस देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि कांग्रेस, सपा तथा बसपा आदि जैसे राजनैतिक दल क्षेत्र विशेष के विकास के बारे में ही सोचते हैं ताकि उनके मुखिया और उनके परिवार के सदस्यों के लिए ऐसे निर्वाचन क्षेत्र का विशिष्ट अस्तित्व बना रहे जहां से वे हमेशा चुनाव जीतते रहें। रायबरेली एवं अमेठी से सर्वाधिक बार नेहरू-गांधी परिवार के ही सदस्यों ने लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया है। देश में एक छोटे से कालखंड को छोड़ दें तो अधिकतर अवधि में केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार रही है और इसी कारण केंद्र की विभिन्न योजनाएँ जिनमें लघु से लेकर भारी उद्योग, राष्ट्रीय स्तर के कई प्रशिक्षण संस्थान आदि सम्मिलित हैं इन्ही दो क्षेत्रों में लाये गए। अभी पिछले दिसंबर की बात है कि श्री राहुल गांधी ने इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय उड्डयन एकेडमी, फुरसतगंज, रायबरेली, जो अमेठी लोकसभा क्षेत्र में है, को विश्वविद्यालय का दर्जा देने के साथ ही साथ बड़ा एयरपोर्ट बनवाने की घोषणा की। यहाँ उल्लेखनीय है कि यह वही उड्डयन विश्वविद्यालय है जिसे केंद्र ने बेगमपेट हवाई अड्डा परिसर हैदराबाद, आंध्र प्रदेश में स्थापित करने की स्वीकृति दे दी थी और उसपर काफी धन भी व्यय हो चुका है। चूंकि श्री राहुल गांधी की यह इच्छा थी इसलिए सरकार ने यह निर्णय ले लिया। दूसरी तरफ रायबरेली के लालगंज में मैडम सोनिया गांधी की इच्छा थी इसलिए रेल कोच कारख़ाना खोल दिया गया और अब उसी लालगंज में केंद्र सरकार 75 कि॰ मी॰ की दूरी पर एसजीपीजीआई स्थित होने के बावजूद एम्स खोलने के लिए आमादा है। अब यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या देश-प्रदेश के समस्त करदाताओं से प्राप्त कर से सृजित भारत राजकोष का व्यय असामान्य रूप से मैडम सोनिया गांधी एवं श्री राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र क्रमशः रायबरेली और अमेठी में करना न्याय संगत है? वास्तव में ऐसा कत्तई नहीं है। यह परोक्ष रूप से मतदाताओं को घूस देने जैसा कृत्य है क्योंकि जिस क्षेत्र में उद्योग, विभिन्न संस्थान, विकसित हवाई अड्डा, एम्स आदि हों वहाँ के लोग नेहरू-गांधी के खानदान के सदस्यों के अलावा अन्य को क्यों विजयी बनायेंगे। इसे सत्ता का दुरुपयोग ही माना जाएगा क्योंकि एक परिवार के लिए जनता के टैक्स का धन दो लोकसभा चुनाव क्षेत्रों को विशिष्ट एवं अजेय कांग्रेसी किले के रूप में विकसित करने में खर्च किया जा रहा है। अतएव यह विशुद्ध रूप से राजनैतिक भ्रष्टाचार है और एम्स को रायबरेली में ही खोलने की कवायद करना कांग्रेसनीत केंद्र सरकार का प्रदेश के शेष भागों की जनता के साथ भेदभाव, बेईमानी एवं कपटतापूर्ण व्यवहार है जो कि प्रत्येक दशा में अक्षम्य है।
जहां तक उ॰ प्र॰ के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव का सवाल है, उन्होने कहा है कि केन्द्र सरकार जमीन मांगे तो हम तुरन्त उपलब्ध करा देंगे। उन्हे रायबरेली में भी एम्स के लिए जमीन उपलब्ध करवाने में कोई ऐतराज नही है। ऐसा होगा भी क्यों? क्योंकि श्री मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में हजारों करोड़ रुपये खर्च कर अपने पैतृक गाँव सैफई को अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर लाने का प्रयास किया। यह तो अच्छा हुआ कि सैफई में विशेषज्ञता चिकित्सा इन्स्टीट्यूट “ग्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान” (रिम) पहले ही खुलवा लिया था अन्यथा प्रस्तावित एम्स वहीं खुलता। अमेठी-रायबरेली की तरह सैफई में एयरपोर्ट, अंतर्राष्ट्रीय साइज का खेल स्टेडियम, 1000 सीट वाला बतानुकूलित एवं साउंड प्रूफ प्रेक्षागृह, 220 केवी पावर प्लान्ट केवल 4000 की आबादी वाले सैफई गाँव के लिए, सैफई मेला परिसर, अत्याधुनिक विश्रामगृह आदि जनता के कर से प्राप्त धन से स्थापित किए गए। इतना ही नहीं वर्ष 2004 के बजट में शिक्षा मद में कुल 71 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे जिसमे से 69 करोड़ उच्च शिक्षा मद के अंतर्गत चौधरी चरण सिंह डिग्री कालेज हैबरा, सैफई, जो कि एक प्राइवेट शिक्षा संस्थान है, को उच्चीकरण हेतु दे दिये गए। यह महाविद्यालय श्री मुलायम सिंह के छोटे भाई श्री शिवपाल सिंह यादव, मंत्री, लोक निर्माण विभाग द्वारा संचालित है। इसकी प्रबंधकारिणी समिति में इन्ही के परिवार के सभी सदस्य हैं। क्या श्री मुलायम सिंह यादव या उनके बेटे श्री अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री उ॰ प्र॰ यह बता सकेंगे की प्रदेश की जनता के कर से अपने गाँव को सिंगापुर बनाना खुला राजनैतिक भ्रष्टाचार नहीं है? अपने गाँव के विकास के नाम पर अवमुक्त जनता के पैसे की जो छलपूर्वक लूट इस यादव परिवार द्वारा की गई, क्या इसे समाजवादी कृत्य माना जाये? सीनियर यादव के पदचिन्हों पर चलते हुए उनके पुत्र एवं वर्तमान मुख्यमंत्री उ॰ प्र॰ ने सैफई की छूटी परियोजना “लायन सफारी पार्क” स्थापित करने हेतु अधिकारियों को तत्काल नया आंकलन प्रस्ताव प्रस्तुत करने को कहा है ताकि कार्य शीघ्र प्रारम्भ हो सके। कितने समतामूलक विचार हैं मुख्यमंत्री जी के कि उनके लिए सैफई के विकास का अर्थ है पूरे प्रदेश का विकास अन्यथा यह प्राथमिकताओं में से एक नहीं होता। अतएव राजनेताओं का यह क्षेत्र विशेष केन्द्रित दृष्टिकोण ही है जिसके कारण लगभग पिछले साढ़े तीन वर्षों से प्रस्तावित एम्स स्थान चयन को लेकर लटका हुआ है और अंततः राजनैतिक भ्रष्टाचार का शिकार होता दिख रहा है।
सुश्री मायावती ने भी अपने मुख्यमंत्रित्व काल के पिछले पाँच वर्षों में केवल और केवल अपने एवं पार्टी के निजी एजेंडों की पूर्ति के लिए जनता के टैक्स के पैसों का हजारों करोड़ रुपये पार्कों के निर्माण एवं ऐसे दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं, जो कम से कम उत्तर प्रदेश में अप्रासंगिक हैं और जिन्हे यहाँ कोई जानता तक नहीं, की अनेकों मूर्तियाँ लगवाने में व्यय कर भीषणतम राजनैतिक भ्रष्टाचार किया। इतना ही नहीं जीतेजी अपनी मूर्तियाँ लगवाकर विश्व में विरला उदाहरण प्रस्तुत किया जो उनकी तानाशाही प्रवृति को इंगित करता है। मैडम मायावती ने भी इसके लिए अपनी रुचि के स्थान लखनऊ, नोयडा एवं सहारनपुर को ही चुना। कैबिनेट की मुहर लगवाकर विधिक मान्यता के आधार पर प्रदेश के राजकोष का खुला दुरुपयोग किया। यह सर्वविदित है कि बसपा के मायने मायावती और मायावती का अर्थ स्वयं में सरकार। ऐसी स्थिति में कैबिनेट कि हैसियत क्या थी इसका सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है। पार्कों एवं मूर्तियों के निर्माण को मैडम की संतुष्टि के स्तर तक ले जाने के लिये बार-बार बदला गया एवं तोड़-फोड़ की गई और इस प्रकार जनता के धन का जमकर दुरुपयोग हुआ। कहा तो यहाँ तक जाता है कि इन निर्माण कार्यों में मैडम मायावती के प्रिय अधिकारी, इंजीनियर और ठेकेदार लगाए गए थे जिनके माध्यम से खुले आम सरकारी धन को लूटा गया। ऐसी स्थिति में राज्य में एम्स सरीखा संस्थान खुले न खुले मैडम को क्या लेना देना था लेकिन खुले तो उनके विशिष्ट क्षेत्र बुंदेलखंड में ही खुले क्योंकि विपक्ष को पटखनी देते हुए सभी विधानसभा सीटें जीतने का जो लक्ष्य था। इससे बड़ा राजनैतिक भ्रष्टाचार और हो क्या सकता है जिसमे नेता एम्स बनाने न दें और अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए इसकी बलि चढ़ा दें।
पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं दलितों की ही बात करने वाले दोनों भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह और सुश्री मायावती ही बता सकते हैं कि हजारों करोड़ रुपये सैफई को साजने-सवारने तथा विभिन्न स्थानो पर पार्कों एवं मूर्तियों के निर्माण में व्यय कर इन वर्गों को कितना लाभ पहुंचाया। हाँ, यह अवश्य है कि इन दोनों ने अपने निजी लाभ को ध्यान में रखकर अपनी अहंकारी प्रवृत्ति की पूर्ति के लिए जनता के पैसे का पूरी तरह दुरुपयोग करते हुए इतिहास में अमर बनने का प्रयास ठीक उसी तरह किया जिस तरह कुछ मुगल बादशाहों ने किया था। लेकिन इन दोनों में से किसी ने शेरशाह सूरी के कल्याणकारी कार्यों की नकल नहीं की। यह तो सत्य है कि यदि इतनी बड़ी धनराशि बिजली उत्पादन में खर्च होती तो प्रदेश में 24 घंटे आपूर्ति होती, सभी सड़के चमचमाती होतीं, सबको शुद्ध पेयजल मिलता, स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं आदि होती और इसका लाभ प्रदेश के सभी वर्गों को मिलता। यदि ऐसा हो जाता तो इन नेताओं को क्या मिलता और इसी के लिए होता है राजनैतिक भ्रष्टाचार जो कि खुले आम कैबिनेट की स्वीकृति के आड़ में किया जाता है।
उ॰ प्र॰ में एम्स के लिए स्थल चयन बिना किसी भेद-भाव के गुण-दोष के आधार होना चाहिए। क्षेत्र विशेष में खोलने कि वाध्यता न हो तो पूर्वाञ्चल भी इसके लिए एक उचित क्षेत्र हो सकता है। पूरे देश ही नहीं विदेश को भी पता है कि गोरखपुर के आस-पास के उ॰ प्र॰ और बिहार के कई जिलों में जापानी इन्सेफ़्लाइटिस महामारी का रूप ले चुकी है। इस रोग से हजारों लोगों की अब तक मृत्यु हो चुकी है जिसमे से अधिकतर बच्चे है। इस क्षेत्र में आबादी का सर्वाधिक घनत्व का होना, गरीबी, निम्न स्तर की स्वास्थ्य सुविधाओं का होना, महामारी से उपचार की कोई स्पेलाइज्ड सुविधा का न होना आदि इसके मुख्य कारण हैं। बिहार और नेपाल के लोगों का भी गोरखपुर पर ही दबाव है। ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र की 7 करोड़ की आबादी के लिए एम्स जैसे एक चिकित्सा संस्थान की अति आवश्यकता है। फिर भी इससे अधिक आवश्यकता प्रदेश के यदि किसी अन्य क्षेत्र में हो तो वहाँ ही खोला जा सकता है लेकिन किसी नेता की मात्र इच्छा की पूर्ति के लिए उसके क्षेत्र विशेष में खोला जाना राजनैतिक भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा होगी।
आज हम एक मजबूत लोकतन्त्र के नागरिक हैं और इसे और मजबूती देने के लिए हम सभी तत्पर भी हैं लेकिन यह तभी संभव है जब सत्ता में बैठे राजनेता सभी के लिए एवं सभी क्षेत्रों के बराबर विकास के लिए कार्य करें। सरकारों से किसी तरह का भेदभाव की उम्मीद नहीं की जाती लेकिन दुखद पहलू यह है कि “अंधा बांटे रेवड़ी घरै-घराना खाय” की कहावत चरितार्थ हो रही है। देश के संसाधनों का असमान वितरण राजनैतिक नुकसान-फायदा को देखकर किया जा रहा है और इसी का परिणाम है कि विशिष्ट क्षेत्र विशेषरूप से विकसित हो रहें अन्य उनसे काफी पीछे हैं। इसी राजनैतिक भ्रष्टाचार के नाते आजतक उत्तर प्रदेश में एम्स स्थापित नहीं हो सका जिसका खामियाजा प्रदेश की जनता विशिष्ट चिकित्सा सुविधाओं से बंचित होकर भुगत रही है।

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
May 5, 2012

नमस्कार ! आप सही लिख रहे हैं ! पहले ये अलीगढ के मेडिकल कॉलेज को एम्स बना रहे थे , फिर गोरखपुर की बात चली , बुन्देलखन की बात चली ……! हम यही चाहते हैं की बने कहीं भी बने लेकिन राजनीती में फस कर खाते में न पड़ जाये ! अच्छा विषय

abhilasha shivhare gupta के द्वारा
May 4, 2012

श्री सिंह साहब… आपने जिस मुडी पर लेख लिखा है यह इस देश की ज्वलंत समस्या है… ये हम भारतियों के लिए शर्मनाक बात है, की भ्रष्टाचारी आज हमारे देश में सर्वेसर्वा है. भ्रष्टाचार सभी देशो में मिल जायेगा पर उसे नियंत्रित करने की नीयत, चाहत, व प्रयास सभी देशो में नहीं है… दुर्भाग्य वश हमारा देश इस प्रयासों से अछूता है…

www.ashuyadav.in के द्वारा
May 3, 2012

डा. साहब पहले आपको नमस्कार | मैं आपके विचारो से पूर्ण सहमत हूँ | आपने जो बिषय उठाया है वो बहुत ही महत्वपूर्ण है | लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा | आज के टाइम में पूर्वांचल को ही एम्स की जरुरत है पश्चिम में तो आगरा है, सैफई है, पास में दिल्ली है , कानपुर भी पास में ही है | लेकिन पूर्वांचल में क्या है | हकीकत में पूर्वांचल को ही एम्स की जरुरत है | ……..

satyavrat shukla के द्वारा
May 3, 2012

डाक्टर जी नमस्कार ,आपने बहुत ही सहीप्रश्न उठाया है और मैं आपके इस लेख से पूर्णतया सहमत हूँ |विकास के लिए मापदंड का निर्धारण पारदर्शी और स्पष्ट होना चहिये


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