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भटकाव की स्थिति में नेहरू युवा केन्द्र

Posted On: 11 Apr, 2012 Others में

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नेहरू युवा केन्द्र की स्थापना एक योजना (स्कीम) के रूप में शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार वर्ष 1972 में की गई थी। इसके पीछे उद्देश्य था कि गैर-छात्र ग्रामीण युवाओं को उनके स्वयं के विकास में अपेक्षित सहयोग प्रदान कर राष्ट्र के विकास के क्रिया-कलापों में संलग्न किया जाये। प्रारंभ में इन केन्द्रों का स्वरूप भारत सरकार के एक अधीनस्थ कार्यालय का था। वर्ष 1987 में युवा कार्य एवं खेल मंत्रालय के एक संकल्प द्वारा मौजूद समस्त केन्द्रों का पुनर्गठन करते हुए एक स्वायत्तशासी संस्था नेहरू युवा केन्द्र संगठन के अंतर्गत लाया गया। इन केन्द्रों को इनके बेहतर प्रबंधन, कार्यक्रमों के अच्छे नियोजन एवं गुणवत्तापूर्ण आयोजन आदि कि मंशा से स्वायत्तता प्रदान कि गई। वर्तमान में पूरे देश में 501 नेहरू युवा केन्द्र जिला स्तर पर स्थापित हैं तथा 122 नए केन्द्र स्थापित किए जाने हैं। जैसा कि आंकड़े बताते हैं यह संगठन पूरे विश्व में युवाओं का सबसे बड़ा संगठन है।

जिला स्तर पर नेहरू युवा केन्द्र के संचालन के लिए जिला युवा समन्वयक के रूप में एक प्रथम श्रेणी अधिकारी, एक लेखाकार एवं एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नियुक्त हैं। इनके अतिरिक्त फील्ड में आयोजित होने वाले क्रिया-कलापों में सहयोग के लिए राष्ट्रीय युवा कोर के अंतर्गत जनपद में प्रत्येक ब्लाक में दो कि दर से स्वयंसेवक तैनात होते हैं। इन स्वयंसेवकों का पूर्णकालिक आधार पर अधिकतम दो वर्ष के लिए नामांकन किया जाता है और इन्हें प्रतिमाह ढाई हजार मानदेय के रूप में दिया जाता है। पूरे देश में प्रतिवर्ष बीस हजार स्वयंसेवकों की तैनाती होती है।
नेहरू युवा केन्द्र संगठन का उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को राष्ट्र विकास की गतिविधियों में सम्मिलित करने के साथ ही साथ उनमे ऐसे कौशल एवं मूल्यों का विकास किए जाने का है कि वे आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष एवं प्रौद्दोगिक राष्ट्र के उपयोगी नागरिक बन सकें। इसी को दृष्टि में रखते हुए संगठन ने सबसे निचले अर्थात ग्राम स्तर पर युवा नेतृत्व विकसित करने एवं अच्छा नागरिक निर्माण करने हेतु दीर्घ अवधि की रणनीति बनायी। इसके लिए 13-35 आयु वर्ग के गैर-छात्र ग्रामीण युवाओं का ग्राम स्तर पर क्लब का गठन करने एवं आत्मनिर्भरता की स्थिति तक ले जाने की प्रक्रिया के दौरान उनके नेतृत्व विकास की नीति बनायी गई। युवाओं में आत्मविश्वास पैदा करने के लिए उन्हे खेल-कूद, सांस्कृतिक एवं स्थानीय विकास की गतिविधियों में सहभाग करने हेतु प्रोत्साहित करने का दायित्व जनपद स्तर पर नेहरू युवा केन्द्रों को सौंपा गया जो कि आज भटकाव कि स्थिति में आ चुके हैं।
नेहरू युवा केन्द्रो के आधार स्तम्भ ग्रामीण युवा एवं उनके द्वारा गठित युवा क्लब हैं जिनका मार्गदर्शन करते हुए मजबूती देना ही इनका प्रथम कार्य है लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है, यह एक विचारणीय विषय है। वस्तुतः स्थिति यह है कि संगठन मुख्यालय के आंकड़ों के अनुसार सर्वे पूर्व (वर्ष 2010 में एक अभियान चलाकर क्लबों का सर्वेक्षण एवं डाटा फीडिंग कि गई) पूरे देश में करीब तीन लाख युवा क्लब एवं अस्सी लाख से ज्यादा युवा इनसे जुड़े हुए थे जिनकी संख्या बाद में आए आंकड़ों के अनुसार आधे से भी कम रह गई जबकि इनकी संख्या प्रतिवर्ष बढ़नी चाहिये। वास्तविकता तो यह है कि जिले में युवा क्लबों कि संख्या, जो निर्धारित मापदंड पूरा करते है, नहीं के बराबर है जिसकी पुष्टि भौतिक सत्यापन से की जा सकती है। निःसन्देह कार्यालय अभिलेख में प्रतिवर्ष नवगठित युवा क्लबों की संख्या दर्शायी जाती है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इससे सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है की जब क्लबों की संख्या नगण्य है या जो हैं भी वे निर्धारित मापदंड को पूरा नहीं करते हैं और निर्धारित परिभाषा से बाहर हो चुके हैं तब नेहरू युवा केन्द्र का ग्रामीण युवाओं से कैसा और किस तरह का जुड़ाव है। हाँ, यह जरूर है कि अपने मंत्रालय के विभिन्न युवा कार्यक्रमों एवं अन्य मंत्रालयों के सहयोग एवं समन्वय से प्राप्त विशेष कार्यक्रमों का आयोजन नेहरू युवा केन्द्रों द्वारा इन्हीं कुछ गिने-चुने क्लबों के माध्यम से कराकर वार्षिक कार्ययोजना का अनुपालन कर लिया जाता है। परिणामतः व्यापक प्रचार-प्रसार न हो पाने के कारण जनपद के युवाओं को न तो नेहरू युवा केन्द्र के बारे में जानकारी हो पाती है और न ही इनके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की। इसके लिए जनपद स्तरीय कार्यालय ही दोषी हैं यह नहीं कहा जा सकता लेकिन नीतियों को लागू करने एवं कार्यक्रमों के आयोजन की ज़िम्मेदारी उन्हीं की है। साथ ही इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस आर्गनाइजेशन में कुछ ऐसे कर्मठ अधिकारी भी हैं जो अपनी दक्षता एवं क्षमता का समुचित उपयोग करते हुए मानक के अनुसार युवा क्लबों का गठन कराते हैं और विभिन्न क्रियाकलापों में युवाओं कि सहभागिता सुनिश्चित करते हुए उनके सशक्तिकरण कि ओर अग्रसर रहते हैं।
अपने स्थापना दिवस के 40वें वर्ष में पदार्पण कर चुका नेहरू युवा केंद्र संगठन, ऐसा प्रतीत होता है, आज भी देश को यह बताने में असमर्थ है कि उसके प्रयास से इतने वर्षों बाद ग्रामीण युवाओं में कितनी आत्मनिर्भरता आयी, उनके आत्मविश्वास में कितनी बृद्धि हुई और अंततः उनकी स्थिति में क्या और कितना परिवर्तन हुआ। युवाओं के सशक्तिकरण में अगर अपेक्षित सफलता नहीं मिली है तो ऐसा क्यों है, यह बताने वाला कोई नहीं है। जो बात स्वतः स्पष्ट होती है उसके अनुसार इसके नीति-नियन्ता ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। भारत सरकार की यह एक ऐसी अनूठी संस्था है जो अपने जन्म काल से अब तक तदर्थवाद पर चल रही है। इसमे कुछ भी स्थायी नहीं है। इसके कर्मचारियों-अधिकारियों के लिए आधी- अधूरी केंद्रीय सेवा नियमावली लागू की गई है जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न स्तरों पर देश के अनेक उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय मे मुकदमे चल रहें हैं। साथ ही जिस सरकारी प्रतिष्ठान में जनपद स्तरीय अधिकारियों अर्थात जिला युवा समन्वयकों का आधा से अधिक पद रिक्त हो और एक-एक अधिकारी के पास दो से तीन या इससे भी अधिक जनपदों का अतिरिक्त चार्ज हो वहाँ कार्य कि स्थिति क्या होगी इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। यह स्थिति तब है जबकि चार वर्ष पूर्व ही समस्त पदों कि स्वीकृति मिल चुकी है। वर्ष 2012 में और 122 नेहरू युवा केन्द्र खोले जाने प्रस्तावित हैं जिसके लिए न तो अधिकारी और न ही लेखाकार के पद स्वीकृत हैं। इतना ही नहीं कुल 28 मंडलों (जोन) में से एक तिहाई में ही नियमित ज़ोनल डायरेक्टर पदस्थापित हैं। शेष में उपनिदेशकों को प्रभारी के रूप में विगत तीन वर्षों से नियुक्त किया गया है। उपनिदेशकों एवं लेखाकारों के भी अनेक पद खाली चल रहें हैं। कई जनपदों में में जिला युवा समन्वयक एवं लेखाकार दोनों का अतिरिक्त प्रभार है और जब वे अपने नियमित केन्द्र पर होते हैं तब माह में कई-कई दिन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कार्यालय को चलाता है। इतना ही नहीं युवाओं के इतने बड़े आर्गनाइजेशन के लिए एक अदद नियमित महानिदेशक नहीं मिल पाते हैं। वस्तुतः विभाग के संयुक्त सचिव (युवा कार्य) के पास इस पद का अतिरिक्त प्रभार रहता जिनके पास स्वयं समय का अभाव रहता है। इतने बड़े संगठन जिसमे पाँच सौ से ज्यादा जनपद स्तरीय कार्यालय हों उसे अतिरिक्त प्रभार से चलाना स्पष्ट करता है कि सरकार युवा कार्यक्रमों के प्रति कितना सचेष्ट है।
नेहरू युवा केंद्र संगठन का दायित्व है की गैर-छात्र ग्रामीण युवाओं, जो कि उसके लक्ष्य समूह हैं, को बदलते हुए आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं भौगोलिक परिवेश में समय के अनुसार जागरूकता अभियान एवं प्रशिक्षण के माध्यम से उनके सम्मुख खड़ी चुनौतियों से मुकाबला करने के लिए तैयार करे लेकिन शायद ऐसा नहीं हो पा रहा है। कारण स्पष्ट है कि हमने लक्ष्य समूह कि समस्याओं एवं आवश्यकताओं को न तो समझने का प्रयास किया और न ही तदनुसार कार्यक्रमों के नियोजन की ओर बढ़े। युवतियों के लिए लगता है इन केन्द्रों के दरवाजे ही बन्द हो गए हैं। कुछ वर्षों पूर्व उनके लिए सिलाई-कढ़ाई, फल संरक्षण, पेंटिंग आदि विधाओं में व्यावसायिक प्रशिक्षण संचालित होते थे जो उनमे कौशल विकास के साथ ही साथ उनके व्यक्तित्व विकास में भी सहायक सिद्ध होते थे, समाप्त कर दिये गए और उनकी जगह पर कोई दूसरे प्रति-स्थापक कार्यक्रम नहीं लाये गए। परिणामतः जमीनी हकीकत यह है कि युवा वर्ग की आधी आबादी नेहरू युवा केंद्र से दूर हो गई।
यह सर्वविदित है कि देश की आबादी में 13 से 15 आयु वर्ग की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक है। देश की जनसंख्या का यह सबसे जीवंत एवं ऊर्जावान हिस्सा, संभवतः सर्वाधिक मूल्यवान मानव संसाधन है जो कि एक अपूर्व जनसांख्यिकीय लाभ अर्जित करने के व्दार पर पहुँच चुका है। यह “उभरता हुआ युवा वर्ग” कार्य प्रतिभागिता तथा निर्भरता अनुपात के आलोक में देश कि वृद्धि एवं विकास के परिप्रेक्ष्य में अवसरों कि प्रचुरता का मार्ग है जिन्हे बिखरने से पहले ही संजो लेने कि आवश्यकता है। यहाँ यक्ष प्रश्न यह है कि क्या नेहरू युवा केन्द्र संगठन ऐसा कर पाने में सक्षम है; निश्चित रूप से है, और ऐसा तब संभव होगा जब तदर्थवाद को समाप्त करते हुए वह अपने अन्दर की कमियों को ढूंढे और युवाओं के लिए जमीन पर उतारे जाने वाले दूर दृष्टि वाले प्रोग्राम बनाए। साथ ही ऐसा करने के लिए उस दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है जिससे उन तत्वों जैसे कार्य के प्रति उदासीनता, पक्षपातपूर्ण रवैया, भ्रष्टाचार आदि जो की संगठन को धीरे-धीरे गर्त की ओर ले जा रहे हैं, पर घातक प्रहार किया जा सके। पिछले दिनों एनएचआरएम घोटाला मामले में नेहरू युवा केन्द्र के एक अधिकारी से सीबीआई द्वारा की गई पूछ-ताछ से संबन्धित विभिन्न टीवी चैनेलों पर दिखाये गए न्यूज़ एवं समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के कारण देश के युवाओं में गए गलत संदेश के साथ ही साथ संगठन की प्रतिष्ठा की जो क्षति हुई उसका आंकलन करना मुश्किल है। यह सब इसलिए होता है क्योंकि ऐसे मामले वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में लाये जाने के बाद ऊंची पहुँच के कारण कोई कार्यवाही नहीं की जाती है। अब समय आ गया है कि नेहरू युवा केन्द्रों कि स्थिति सुधारने के लिए सरकार कठोर एवं प्रभावी कदम उठाए अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि देश के अन्य घोटालों की पंक्ति में यह भी खड़ा हो जाये। यदि ऐसा होता है तो देश के ग्रामीण युवाओं के साथ बहुत ही बड़ा विश्वासघात होगा।
(डॉ एच सी सिंह, पूर्व ज़ोनल डाइरेक्टर, नेहरू युवा केन्द्र संगठन)

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
April 13, 2012

कभी इनकी सराहना करी जाती थी , आज के युग में इन्हें पूछना वाला कोई नहीं ! बढ़िया विषय , अच्छा लेखन !


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